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ईरान का धार्मिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: शिया और सुन्नी का संघर्ष

ईरान का इतिहास और धार्मिक संरचना जटिल है, जिसमें शिया और सुन्नी समुदायों के बीच का संघर्ष प्रमुख है। ईरान में शिया इस्लाम की गहरी जड़ें हैं, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश बनाती हैं। इस लेख में हम ईरान के ऐतिहासिक महत्व, शिया और सुन्नी के बीच के मतभेद, और इस्लामिक क्रांति के बाद शिया धर्मगुरुओं की बढ़ती शक्ति पर चर्चा करेंगे। जानें कैसे ये तत्व ईरान की राजनीति और समाज को प्रभावित करते हैं।
 

ईरान का ऐतिहासिक महत्व

ईरान का इतिहास काफी समृद्ध और शक्तिशाली रहा है। समय के साथ इसकी सीमाएं घटती-बढ़ती रही हैं। प्राचीन ईरान की तुलना में आज का ईरान कई आक्रमणों का शिकार हुआ है, जिसमें सिकंदर, तुर्क और अरब देशों के आक्रमणकारी शामिल हैं। कहा जाता है कि सातवीं शताब्दी में अरब खलीफाओं ने ईरान के आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। आठवीं सदी तक, पारसी बहुसंख्यक ईरान में इस्लामी कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाने लगा, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ। इस्लामी शासन के आगमन के बाद, लाखों पारसी पूर्व की ओर पलायन करने लगे, जिनमें से कुछ भारत में बस गए।


ईरान में शिया और सुन्नी की स्थिति

ईरान एक इस्लामिक राष्ट्र है, जहां लगभग 99 प्रतिशत लोग इस्लाम का पालन करते हैं। यहां के मुसलमानों में से 90 से 95 प्रतिशत शिया हैं, जबकि 5 से 10 प्रतिशत सुन्नी हैं। इस कारण, ईरान को विश्व का सबसे बड़ा शिया बहुल देश माना जाता है। इसके अलावा, यहां यहूदी, ईसाई, पारसी और बहाई समुदाय के लोग भी रहते हैं, लेकिन बहाई धर्म को आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है।


शिया और सुन्नी: परिभाषा और अंतर

सुन्नी: सुन्नी मुसलमान वे हैं जो पैगंबर मोहम्मद के तरीकों का पालन करते हैं। दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं।


शिया: शिया मुसलमानों की धार्मिक मान्यताएं और इस्लामी कानून सुन्नियों से भिन्न हैं। वे पैगंबर मोहम्मद के बाद इमामों को नेतृत्व देने के पक्षधर हैं।


धार्मिक विभाजन का कारण

पैगंबर मोहम्मद के निधन के बाद, उनके उत्तराधिकारी को लेकर दोनों समुदायों में मतभेद उत्पन्न हुए। एक पक्ष का मानना था कि योग्य व्यक्ति को चुना जाना चाहिए, जबकि दूसरे पक्ष का मानना था कि पैगंबर ने अपने दामाद हजरत अली को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। इस प्रकार, सुन्नी और शिया समुदायों का विभाजन हुआ।


ईरान में शिया इस्लाम का प्रभाव

ईरान में शिया इस्लाम की जड़ें गहरी हैं। यहां बारह इमामों को मानने वाला शिया संप्रदाय राजकीय धर्म है। शिया मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर के बाद नेतृत्व उनके परिवार के लोगों को मिलना चाहिए था। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद, शिया धर्मगुरुओं की शक्ति में वृद्धि हुई, और आज वे राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।