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ईरान के नेता खामेनेई की हत्या: सऊदी अरब की भूमिका पर उठे सवाल

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के संबंध में नए खुलासे सामने आए हैं, जो अमेरिका और सऊदी अरब के बीच के संबंधों पर सवाल उठाते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, खामेनेई उस समय अपने सहयोगियों के साथ बैठक में थे जब उन पर हमला हुआ। सऊदी अरब की भूमिका को लेकर कई महत्वपूर्ण दावे किए गए हैं, जिसमें यह भी कहा गया है कि सऊदी क्राउन प्रिंस ने अमेरिका को इस हमले के लिए उकसाया। इस लेख में हम इन घटनाओं के पीछे की सच्चाई और सऊदी-ईरान के बीच के पुराने तनाव पर चर्चा करेंगे।
 

खामेनेई की हत्या के नए खुलासे


ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के संबंध में नए तथ्य सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, इस हमले की योजना और समय को लेकर कई महत्वपूर्ण खुलासे हुए हैं। इन दावों ने अमेरिका, सऊदी अरब और ईरान के बीच के संबंधों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।


हमले की समय सीमा और साजिश

रिपोर्टों के अनुसार, खामेनेई उस समय अपने करीबी सहयोगियों के साथ बैठक में थे जब उन पर हमला हुआ। इस बैठक में उनके सलाहकार अली शमखानी और IRGC के प्रमुख मोहम्मद पाकपूर भी शामिल थे। इस दौरान हुए सटीक हमले में उनकी जान चली गई। इस हमले की योजना को लेकर कहा जा रहा है कि यह बहुत सोच-समझकर किया गया था।


सऊदी अरब की भूमिका पर सवाल

अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने यह दावा किया है कि सऊदी अरब के उकसावे पर अमेरिका ने यह कार्रवाई की। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस हमले के पक्ष में नहीं थीं, लेकिन सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सीधे ट्रंप से बात कर उन्हें मनाया। हालांकि, सऊदी अरब ने इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।


तीन महत्वपूर्ण दावे

मीडिया रिपोर्टों में सऊदी अरब की भूमिका को लेकर तीन महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं। पहला, जब ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते पर बातचीत चल रही थी, तब क्राउन प्रिंस ने कई बार ट्रंप से संपर्क किया। उनका मानना था कि यही हमला करने का सही समय है।


दूसरा, जनवरी 2026 में एक्सियोस की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने व्हाइट हाउस का दौरा किया और ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की मांग की। तीसरा, वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, सऊदी का तर्क था कि यदि अभी कार्रवाई नहीं की गई, तो ईरान भविष्य में और मजबूत हो जाएगा।


सऊदी-ईरान के बीच पुरानी दुश्मनी

सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ने लगे। 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान सऊदी ने इराक का समर्थन किया। 1988 में हज के दौरान हुई झड़प में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद रिश्ते और खराब हो गए।


मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की होड़ भी इस टकराव का एक बड़ा कारण है। सऊदी एक सुन्नी बहुल देश है, जबकि ईरान शिया बहुल। यमन, लेबनान और सीरिया जैसे देशों में प्रभाव को लेकर दोनों के बीच लगातार प्रतिस्पर्धा रही है। सऊदी को यह डर है कि क्षेत्र में ईरान का बढ़ता प्रभाव उसके तेल कारोबार और रणनीतिक हितों को नुकसान पहुंचा सकता है।