कैरिबियन सागर में अमेरिकी सेना की कार्रवाई: क्या है असली सच?
नई दिल्ली में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विवरण
नई दिल्ली: लैटिन अमेरिका में ड्रग तस्करी के खिलाफ ट्रंप प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे कठोर अभियान के तहत, अमेरिकी सेना ने कैरिबियन सागर में एक संदिग्ध नाव पर हमला किया। इस सैन्य कार्रवाई में चार व्यक्तियों की जान चली गई। इस घटना के बाद से कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर में अमेरिकी हमलों में मारे गए संदिग्धों की संख्या अब 231 तक पहुंच गई है।
नार्को-टेररिस्ट्स के खिलाफ अभियान
नार्को-टेररिस्ट्स के खिलाफ जारी है सैन्य कार्रवाई
ट्रंप प्रशासन ने लैटिन अमेरिकी जलक्षेत्र में सक्रिय कथित 'नार्को-टेररिस्ट' समूहों के खिलाफ एक अभियान की शुरुआत की थी। अमेरिकी सदर्न कमांड के अनुसार, इस अभियान के तहत अब तक 69 से अधिक घातक हमले किए जा चुके हैं।
ये हमले उन पारंपरिक समुद्री तस्करी मार्गों पर किए गए हैं, जिनका उपयोग अवैध पदार्थों को अमेरिका पहुंचाने के लिए किया जाता रहा है।
सैन्य कार्रवाई पर उठते सवाल
बिना सबूतों के कार्रवाई पर उठे सवाल
इस सैन्य अभियान की पारदर्शिता को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अमेरिकी सेना ने अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत या प्रामाणिक दस्तावेज नहीं प्रस्तुत किया है, जिससे यह साबित हो सके कि शनिवार को निशाना बनाई गई नाव पर वास्तव में कोई ड्रग्स मौजूद थी।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो में केवल एक तेज़ रफ्तार नाव और उसके बाद अचानक हुए धमाके की झलक दिखाई देती है। बिना किसी ठोस सबूत या जांच के की जा रही ऐसी कार्रवाइयों से अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली पर संदेह गहरा हो गया है।
सुरक्षा के नाम पर उठते सवाल
सुरक्षा का दावा
जहां ट्रंप प्रशासन इन कठोर कार्रवाइयों को अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा और देश में नशीले पदार्थों की अवैध खेप को रोकने के लिए आवश्यक मानता है, वहीं मानवाधिकार संगठन इस दृष्टिकोण से असहमत हैं। मानवाधिकार समूहों ने इन सैन्य हमलों को 'हत्याएं' (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स) करार दिया है। बिना किसी निष्पक्ष अदालती प्रक्रिया या पुख्ता सबूतों के ये हमले न केवल अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि लैटिन अमेरिकी देशों की क्षेत्रीय संप्रभुता और सुरक्षा के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं।