क्या अमेरिका ने ईरान के खिलाफ दोहरी रणनीति अपनाई? पाकिस्तान में शांति वार्ता का नतीजा शून्य
अमेरिका-ईरान वार्ता का नतीजा
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में आयोजित शांति वार्ता पहले ही दिन बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गई। लगभग 21 घंटे तक चली इस बातचीत के बाद भी दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई, जिससे इस प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं। अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या ईरान को फिर से रणनीतिक दबाव में लाने का प्रयास किया गया है।
अमेरिका की सैन्य गतिविधियों का प्रभाव
इस वार्ता के दौरान अमेरिका की सैन्य गतिविधियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया। जहां एक ओर बातचीत चल रही थी, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोतों को तैनात कर दिया, जिससे उसके इरादों पर नई बहस छिड़ गई है।
सैन्य तैनाती की जानकारी
अमेरिकी सेंटकॉम के अनुसार, उसके दो डेस्ट्रॉयर, यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन और यूएसएस माइकल मर्फी, इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को पार कर चुके हैं। ये जहाज बारूदी सुरंगों को हटाने के मिशन में लगे हुए हैं, जिसे वैश्विक व्यापार की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया गया है। हालांकि, ईरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि होर्मुज पर उसका नियंत्रण है और बिना अनुमति कोई भी सैन्य गतिविधि स्वीकार्य नहीं है।
बातचीत का निष्कर्ष
21 घंटे की वार्ता का परिणाम
इस्लामाबाद में हुई इस लंबी वार्ता के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस को खाली हाथ लौटना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने अपनी 'रेड लाइन' को स्पष्ट कर दिया था, लेकिन ईरान ने इसे मानने से इनकार कर दिया। ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने बातचीत के दौरान अत्यधिक शर्तें थोप दीं, जिससे संतुलन बिगड़ गया।
पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल
मध्यस्थता और सैन्य तैनाती
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा का विषय रही। एक ओर वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहा था, वहीं दूसरी ओर उसने सऊदी अरब में अपने फाइटर जेट तैनात कर दिए। यह तैनाती दोनों देशों के रक्षा समझौते के तहत की गई बताई गई, लेकिन इसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और दबाव की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
अमेरिका की दोहरी रणनीति का आरोप
क्या अमेरिका ने दोहरी रणनीति अपनाई?
पूरे घटनाक्रम को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका ने एक साथ दो रणनीतियां अपनाईं। एक ओर वार्ता के जरिए समाधान की कोशिश दिखाई गई, वहीं दूसरी ओर सैन्य दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाने का प्रयास किया गया।
ऐसी स्थिति पहले भी देखी गई है
पिछले घटनाक्रम की तुलना
इस स्थिति की तुलना 28 फरवरी की उस घटना से की जा रही है, जब बातचीत के दौरान अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था। उस समय भी हालात सामान्य दिख रहे थे, लेकिन अचानक हुए हमले ने सभी को चौंका दिया था। इसी वजह से अब यह आशंका फिर से जताई जा रही है कि कहीं बातचीत के बीच ईरान को धोखा देने की रणनीति तो नहीं अपनाई जा रही।