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क्या मक्का रक्षा समझौता है महज एक दिखावा? सऊदी अरब पर ड्रोन हमले ने उठाए सवाल

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जाजान में हूती विद्रोहियों द्वारा किए गए ड्रोन हमले के बाद, पाकिस्तान और तुर्की की प्रतिक्रिया ने इस समझौते की व्यावहारिकता पर संदेह उत्पन्न किया है। क्या यह समझौता वास्तव में सुरक्षा को मजबूत करेगा, या यह केवल एक दिखावा है? जानिए इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर और अधिक जानकारी।
 

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का रक्षा समझौता विवादों में


नई दिल्ली: हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते ने अपने पहले बड़े परीक्षण में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। समझौते के केवल 48 घंटे बाद, यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जाजान में अरामको रिफाइनरी को ड्रोन से निशाना बनाया। इस हमले के बाद पाकिस्तान और तुर्की ने कोई तात्कालिक सैन्य कार्रवाई का ऐलान नहीं किया।


समझौते पर उठते सवाल

मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसे कई जगहों पर 'इस्लामिक नाटो' के रूप में संदर्भित किया गया है।


इस समझौते का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों की सुरक्षा को मजबूत करना है। इसके तहत यदि किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो इसे तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। लेकिन जाजान में ड्रोन हमले के बाद पाकिस्तान और तुर्की की प्रतिक्रिया ने इस व्यवस्था की व्यावहारिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


जाजान रिफाइनरी पर हमला

हूती सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि जाजान पर हमला सऊदी अरब के सादा और हज्जाह प्रांतों में चल रहे ड्रोन अभियानों के जवाब में किया गया। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने भी रिफाइनरी में आग लगने की पुष्टि की, जिसे बाद में नियंत्रित कर लिया गया।


हालांकि, हमले के बावजूद गठबंधन के अन्य दो सदस्य देशों ने तुरंत किसी सैन्य प्रतिक्रिया का ऐलान नहीं किया। इससे रक्षा समझौते के बड़े दावों की वास्तविकता पर बहस तेज हो गई है।


सैन्य कार्रवाई से पहले बातचीत

इस समझौते की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी हमले के बाद सैन्य कार्रवाई अपने आप शुरू नहीं होगी। तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फिदान के अनुसार, सदस्य देश पहले चर्चा करेंगे कि हमले की स्थिति में किस प्रकार और कितनी सहायता दी जानी चाहिए। इसका मतलब यह है कि यह व्यवस्था NATO के Article 5 जैसी सामूहिक सुरक्षा की भावना रखती है, लेकिन तत्काल सैन्य हस्तक्षेप की गारंटी नहीं देती।


पुराने अनुभवों की चिंता

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले भी रक्षा सहयोग समझौता हो चुका है। इसके बावजूद, अतीत में सऊदी ठिकानों पर हमलों के दौरान पाकिस्तान ने सीधे युद्ध में शामिल होने के बजाय सैनिकों, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखी थी।