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चिली में मिले प्राचीन चेचक वायरस के अवशेषों से नई जानकारी मिली

हाल ही में चिली में मिले प्राचीन चेचक वायरस के अवशेषों ने शोधकर्ताओं को महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। इस अध्ययन में चेचक के वेरियोला वायरस के प्राचीन डीएनए के अंश प्राप्त हुए हैं, जो मानवता की एकमात्र पूरी तरह समाप्त की गई संक्रामक बीमारी से संबंधित हैं। शोध में यह भी पता चला है कि ये वायरस यूरोप में पहले पाए गए वायरस के प्रकारों से संबंधित थे। जानें इस खोज के पीछे की कहानी और इसके स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव।
 

चेचक का इतिहास और नए शोध

(एरिस काट्जौराकिस, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड) ऑक्सफोर्ड, 16 सितंबर (द कन्वरसेशन) चेचक, जो मानवता की एकमात्र पूरी तरह समाप्त की गई संक्रामक बीमारी है, के बारे में हाल ही में एक महत्वपूर्ण खोज हुई है। शोधकर्ताओं ने उत्तरी चिली में दफन दो मूल निवासियों के प्राकृतिक रूप से ममीकृत अवशेषों से चेचक के वेरियोला वायरस के प्राचीन डीएनए के अंश प्राप्त किए हैं। यह बीमारी सदियों से विनाशकारी महामारियों का कारण रही है।


वेरियोला मेजर, चेचक का एक गंभीर रूप, संक्रमित व्यक्तियों में लगभग 30 प्रतिशत की मृत्यु दर का कारण बनता था। अमेरिका में चेचक का पहला ज्ञात प्रकोप 1518 में हिस्पानियोला द्वीप पर हुआ था। सोलहवीं सदी में फैली महामारियों ने यूरोपीय उपनिवेशवाद के दौरान स्वदेशी जनसंख्या में भारी जनहानि का कारण बनीं।


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 1967 में चेचक उन्मूलन के लिए एक अभियान शुरू किया, जिसमें टीकाकरण, निगरानी और संक्रमण नियंत्रण के उपाय शामिल थे। 1977 में सोमालिया में चेचक का अंतिम ज्ञात मामला सामने आया, और 1980 में डब्ल्यूएचओ ने इसे पूरी दुनिया से समाप्त घोषित कर दिया।


वर्तमान में, जीवित वेरियोला वायरस को डब्ल्यूएचओ द्वारा मान्यता प्राप्त दो अत्यधिक सुरक्षित प्रयोगशालाओं में रखा गया है। चिली में मिले नमूनों में केवल सदियों से संरक्षित आनुवंशिक अंश हैं, जो लगभग 1492 से 1631 के बीच के हैं।


ये प्राचीन चेचक जीनोम के पहले नमूने हैं जो अमेरिका से प्राप्त हुए हैं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड पहले से ही संकेत देते थे कि यूरोपीय संपर्क के बाद चेचक अमेरिका पहुंचा। नए अध्ययन में मिले आणविक प्रमाण से यह स्पष्ट हुआ कि चिली के वायरस यूरोप में पहले पाए गए वायरस के प्रकारों से संबंधित थे।


हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वायरस किसने लाया या यह समुदाय तक कैसे पहुंचा। ममीकृत अवशेषों पर त्वचा के छोटे घाव भी पाए गए हैं, जिन्हें पहले लंबे समय तक आर्सेनिक के संपर्क में रहने से जोड़ा गया था।


हाल ही में मिले वेरियोला डीएनए ने पुष्टि की कि दोनों लोग चेचक से संक्रमित थे, इसलिए ये घाव चेचक से भी संबंधित हो सकते हैं। हालांकि, डीएनए यह साबित नहीं करता कि घावों का कारण चेचक था या किसी की मृत्यु इसी बीमारी से हुई। शोधकर्ताओं को वायरस के डीएनए के केवल अंश मिले हैं और कोई पूर्ण वायरस कण नहीं मिला।


प्राचीन डीएनए समय के साथ छोटे टुकड़ों में टूट जाता है। वैज्ञानिक इन बचे हुए टुकड़ों का अनुक्रमण कर कंप्यूटर की मदद से उनके मूल क्रम का पुनर्निर्माण करते हैं। इसलिए दो जीनोम के ‘पुनर्निर्माण’ का अर्थ वास्तविक वायरस बनाना नहीं है।


चेचक के वायरस कण में पूरा जीनोम और प्रजनन के लिए आवश्यक प्रोटीन एवं एंजाइम होते हैं, जो इन प्राचीन डीएनए टुकड़ों में मौजूद नहीं हैं। इसलिए ये टुकड़े अपने आप चेचक पैदा नहीं कर सकते। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2018 में विशेष रूप से तैयार सिंथेटिक डीएनए से हॉर्सपॉक्स वायरस का पुनर्निर्माण किया था, लेकिन इसके लिए अत्यधिक विशेषज्ञता वाली प्रयोगशाला प्रक्रियाओं और एक सहायक पॉक्सवायरस की आवश्यकता थी।


चिली के अध्ययन में केवल प्राकृतिक रूप से क्षतिग्रस्त डीएनए का अनुक्रमण और कंप्यूटर पर उसका विश्लेषण किया गया। इससे चेचक के दोबारा लौटने का कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं बनता। वायरस के प्रजनन के दौरान आनुवंशिक बदलाव जमा होते जाते हैं।


इनकी तुलना से वैज्ञानिक वायरस का विकासवादी इतिहास समझ सकते हैं। चिली में मिले दोनों वायरस अब विलुप्त हो चुके एक वंश से संबंधित थे, जो करीब 1296 में वेरियोला वायरस के अन्य ज्ञात वंशों से अलग हुआ था। यह विकासवादी विभाजन की अनुमानित तारीख है, न कि चेचक के चिली पहुंचने की तारीख।


चिली के जीनोम शुरुआती मध्ययुगीन यूरोपीय वायरसों के बाद और बाद की सदियों में फैलने वाले वंशों से पहले की शाखा पर हैं। इनके यूरोपीय वायरसों से संबंध और अवशेषों की 1492 के बाद की तारीखें इस निष्कर्ष का समर्थन करती हैं कि चेचक उपनिवेशवाद के दौरान अमेरिका पहुंचा। जीनोम से यह भी पता चलता है कि वेरियोला वायरस समय के साथ मनुष्यों को संक्रमित करने के लिए अधिक विशिष्ट होता गया।


कई संबंधित पॉक्सवायरस कई पशु प्रजातियों को संक्रमित कर सकते हैं, लेकिन वेरियोला केवल मनुष्यों को संक्रमित करता है। इसके विकास के दौरान कुछ सहायक जीन निष्क्रिय हुए या पूरी तरह गायब हो गए। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को ‘रिडक्टिव इवोल्यूशन’ कहते हैं।


हालांकि, केवल जीनों का नुकसान यह नहीं समझाता कि चेचक इतना घातक क्यों था। बीमारी की गंभीरता वायरस के जीन और मानव प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच जटिल संबंधों पर निर्भर करती है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि वायरस का विकास एक समान गति से नहीं हुआ।


सोलहवीं सदी के अंत तक जीन का निष्क्रिय होना लगभग स्थिर गति से जारी रहा, जिसके बाद कुछ समय तक आनुवंशिक बदलावों की गति धीमी हुई और फिर बढ़ गई। लेखकों का अनुमान है कि औपनिवेशिक दौर की महामारियों में वेरियोला पहले से ही ऐसी आबादी में फैलने के लिए अनुकूलित था, जिसमें चेचक के खिलाफ प्रतिरक्षा कम थी। वर्ष 1796 में टीकाकरण शुरू होने के बाद प्रतिरक्षा का वातावरण बदला और इससे वायरस में कुछ आनुवंशिक बदलावों के बने रहने की संभावना प्रभावित हुई होगी।


हालांकि, अध्ययन यह साबित नहीं करता कि बदलाव की गति में परिवर्तन का कारण यही था। चिली से मिले ये आनुवंशिक अनुक्रम मध्ययुगीन यूरोप से प्राप्त जीनोम और बाद के वेरियोला वंशों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी उपलब्ध कराते हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि चेचक अमेरिका तक कैसे पहुंचा और वहां फैलने के दौरान उसमें किस तरह विकासवादी बदलाव हुए।