×

चीन की तेल रणनीति: वैश्विक संकट के लिए पहले से तैयार

चीन ने वैश्विक तेल संकट के लिए अपनी तैयारी को पहले से ही शुरू कर दिया था। इस लेख में जानें कि कैसे बीजिंग ने सस्ते तेल की खरीद और भंडारण रणनीतियों के माध्यम से खुद को इस अस्थिरता के दौर के लिए तैयार किया है। जानें कि कैसे यह रणनीति न केवल चीन को सबसे बड़ा तेल खरीदार बनाती है, बल्कि वैश्विक बाजार पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
 

चीन की तैयारी और वैश्विक तेल संकट


नई दिल्ली: वैश्विक तेल आपूर्ति में बढ़ती अनिश्चितता के बीच, बाजार संभावित संकट के लिए तैयार हो रहे हैं। दूसरी ओर, चीन की रणनीति एक अलग कहानी बयां कर रही है, जो यह दर्शाती है कि वह इस अस्थिरता के लिए पहले से ही तैयार था।


तेल की कीमतों में गिरावट न आने और बाजार में अस्थिरता के पीछे चीन की रणनीति एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है। बीजिंग ने पहले ही ऐसे कदम उठाए हैं, जो उसे अन्य देशों से आगे रखते हैं।


तेल संकट की आशंका और वैश्विक चिंता

लैरी फिंक ने चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।


उन्होंने कहा कि तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जो "वैश्विक मंदी को जन्म दे सकती है"।


मैक्वेरी, कोटक सिक्योरिटीज और नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज जैसी ब्रोकरेज फर्मों ने भी अनुमान लगाया है कि कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।


चीन की पहले से बनी रणनीति

जबकि दुनिया होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर नजर रख रही है, चीन ने पहले ही संभावित संकट को भांपते हुए अपनी तैयारी शुरू कर दी थी।


2025 की शुरुआत से, चीन अपनी घरेलू जरूरतों से अधिक कच्चा तेल आयात कर रहा है। जनवरी और फरवरी में, देश ने लगभग 1.24 मिलियन बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त तेल जमा किया, जो उसकी भंडारण रणनीति को दर्शाता है।


सस्ते दामों पर आक्रामक खरीद

चीन ने रूस, ईरान और वेनेजुएला जैसे प्रतिबंधित देशों से भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदा, जिससे उसे वैश्विक बाजार की तुलना में कम कीमत पर तेल प्राप्त हुआ।


ऊर्जा विशेषज्ञ अनस अलहाजी के अनुसार, "दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक के रूप में, चीन ने भू-राजनीतिक प्रतिबंधों को ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और लागत बचत के अवसर में बदल दिया है।"


विशाल और गुप्त भंडारण तंत्र

पिछले एक दशक में, चीन ने एक दो-स्तरीय भंडारण प्रणाली विकसित की है, जिसमें सरकारी रणनीतिक भंडार और राज्य-नियंत्रित वाणिज्यिक टैंक शामिल हैं।


इन भंडारों की कुल क्षमता लगभग 1.1 से 1.2 बिलियन बैरल आंकी गई है, जिसमें भूमिगत गुफाओं से लेकर बड़े टैंक फार्म शामिल हैं।


बाजार को प्रभावित करने की क्षमता

चीन ने अपने भंडार को केवल आपातकालीन उपयोग तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक सक्रिय बाजार उपकरण के रूप में भी इस्तेमाल किया है। कम कीमतों पर बड़े पैमाने पर खरीद और जरूरत पड़ने पर आपूर्ति को रोकने की रणनीति ने वैश्विक बाजार को प्रभावित किया है।


2025 और 2026 के दौरान प्रतिदिन 10 लाख बैरल से अधिक अतिरिक्त आपूर्ति को अवशोषित कर, चीन ने कीमतों को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


चीन का बढ़ता प्रभाव

इस रणनीति के कारण, चीन न केवल दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार बन गया है, बल्कि वह ऐसा खिलाड़ी भी बन गया है जो मांग और आपूर्ति दोनों पक्षों से कीमतों को प्रभावित कर सकता है।


ओपेक प्लस और पश्चिमी देशों के लिए यह एक नई चुनौती बनकर उभरा है, क्योंकि अब उन्हें चीन के फैसलों के अनुसार अपनी नीतियों को समायोजित करना पड़ सकता है।


निष्कर्ष: अस्थिरता के लिए पहले से तैयार था चीन

चीन को ईरान संकट के समय या स्वरूप का सटीक अंदाजा भले ही न रहा हो, लेकिन उसने यह समझ लिया था कि सस्ते और स्थिर तेल का दौर समाप्त होने वाला है।


इसी सोच के तहत, समय रहते भंडार बढ़ाकर और उसे रणनीतिक हथियार में बदलकर, बीजिंग ने खुद को इस अस्थिर दौर के लिए तैयार कर लिया।