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चीन की दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ती सैन्य मौजूदगी: भारत के लिए चिंता का विषय

चीन की लाओस और कंबोडिया में सैन्य गतिविधियों का विस्तार भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। नई दिल्ली को यह चिंता है कि बीजिंग अपनी सैन्य उपस्थिति को छोटे लेकिन रणनीतिक कदमों के माध्यम से स्थायी बना रहा है। लाओस में एक नया हवाई प्रशिक्षण केंद्र और कंबोडिया के रीम नौसैनिक अड्डे पर लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना से भारत की रणनीतिक स्थिति प्रभावित हो रही है। जानें कि कैसे ये गतिविधियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की बढ़ती सैन्य भूमिका को दर्शाती हैं और भारत को क्या कदम उठाने चाहिए।
 

नई दिल्ली की चिंताएं


नई दिल्ली: भारत के लिए चिंता का विषय केवल यह नहीं है कि लाओस में चीन के सहयोग से एक नया हवाई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हुआ है, या कंबोडिया के रीम नौसैनिक अड्डे पर चीन के साथ मिलकर लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षण केंद्र का निर्माण किया गया है। असली सवाल यह है कि बीजिंग दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य उपस्थिति को कैसे छोटे लेकिन रणनीतिक कदमों के माध्यम से स्थायी बना रहा है। 29 सितंबर 2026 को लाओस के बान केउन एयरपोर्ट पर चीन-लाओस संयुक्त सहायता एवं प्रशिक्षण केंद्र और चीन-लाओस फ्रेंडशिप एविएशन अकादमी का उद्घाटन हुआ।


सैन्य सहयोग का नया मॉडल

चीन इसे लाओस की वायुसेना के पायलटों के प्रशिक्षण और दोनों सेनाओं के सहयोग से जोड़ रहा है। हालांकि, सैटेलाइट तस्वीरों में वहां आठ K-8 हल्के हमलावर/प्रशिक्षण विमान और दो दर्जन से अधिक सपोर्ट वाहन दिखाई देने के बाद इस सुविधा की रणनीतिक क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं।


चीन का असली उद्देश्य


दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन का मुख्य लाभ पारंपरिक विदेशी सैन्य अड्डे बनाना नहीं, बल्कि स्थानीय सेनाओं के साथ ऐसा ढांचा तैयार करना है जिसमें प्रशिक्षण, उपकरण, रखरखाव और सैन्य संचालन में उसकी भूमिका बढ़ती जाए। बान केउन इसी मॉडल का एक उदाहरण बन सकता है। चीन और लाओस ने इसे संयुक्त रूप से संचालित करने की योजना बनाई है, जिससे बीजिंग को लाओस की सैन्य क्षमता के विकास में सीधी भागीदारी मिलती है।


बान केउन की रणनीतिक स्थिति

बान केउन की लोकेशन ने बढ़ाई चर्चा


बान केउन वियनतियाने से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, यहां रनवे, टैक्सीवे, पार्किंग क्षेत्र और अन्य बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास हो रहा है। विशेषज्ञों ने इस स्थान की संभावित भविष्य की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि यहां केवल प्रशिक्षण गतिविधियां होंगी या समय के साथ इसकी भूमिका और विस्तारित हो सकती है।


कंबोडिया में चीन की उपस्थिति

समुद्र से लेकर आसमान तक बन रहा कनेक्शन


चीन की दूसरी महत्वपूर्ण उपस्थिति कंबोडिया के रीम नौसैनिक अड्डे पर देखी जा सकती है। अप्रैल 2025 में वहां कंबोडिया-चीन संयुक्त लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षण केंद्र का उद्घाटन हुआ। कंबोडियाई सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य उसकी नौसेना की क्षमता बढ़ाना और समुद्री सुरक्षा में सहयोग करना है।


भारत की चिंताएं

भारत की चिंता यहां से शुरू होती है


लाओस और कंबोडिया दोनों भारत की मेकांग-गंगा सहयोग व्यवस्था का हिस्सा हैं। इस मंच में भारत के साथ पांच ASEAN देश शामिल हैं। यह मंच वर्ष 2000 में वियनतियाने में शुरू हुआ था और इसका फोकस संस्कृति, पर्यटन, शिक्षा तथा परिवहन एवं संपर्क जैसे क्षेत्रों पर रहा है।


क्या चीन भारत को घेर रहा है?

क्या चीन भारत को सीधे घेर रहा है?


इस सवाल का सीधा जवाब देना जल्दबाजी होगी। लाओस का बान केउन भारत की सीमा के पास नहीं है और वहां चीन की ओर से भारत के खिलाफ किसी अभियान की घोषणा भी नहीं हुई है।


भारत की रणनीति

भारत के सामने जवाब का रास्ता क्या है?


भारत के लिए सबसे जरूरी बात यह होगी कि वह दक्षिण-पूर्व एशिया में केवल सांस्कृतिक रिश्तों तक सीमित न रहे। लाओस के साथ भारत के राजनयिक संबंध 1956 से हैं और 2026 में दोनों देश संबंधों की 70वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।


सामरिक दृष्टिकोण

कहानी दो ठिकानों की नहीं, प्रभाव के विस्तार की है


लाओस और कंबोडिया में चीन की गतिविधियों को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने के बजाय पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया के बदलते रणनीतिक नक्शे के हिस्से के रूप में देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है।