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चीन में कंडोम टैक्स: जनसंख्या संकट का नया समाधान

चीन ने 2026 से कंडोम पर 13% वैल्यू एडेड टैक्स लगाने का निर्णय लिया है, जिसे लोग 'कंडोम टैक्स' कह रहे हैं। यह कदम जनसंख्या संकट को हल करने के लिए उठाया गया है। चीन की जनसंख्या में गिरावट और श्रम की कमी के कारण वैश्विक उत्पादन पर प्रभाव पड़ेगा। भारत के लिए यह एक अवसर बन सकता है, क्योंकि उसकी युवा जनसंख्या और वैश्विक कंपनियों की 'चाइना प्लस वन' रणनीति उसे एक प्रमुख उत्पादन केंद्र बना सकती है। जानें इस मुद्दे के सभी पहलुओं के बारे में।
 

चीन का नया निर्णय


नई दिल्ली: चीन ने 2026 की शुरुआत एक विवादास्पद निर्णय के साथ की है, जिसने वैश्विक स्तर पर कई लोगों को चौंका दिया है। 1 जनवरी, 2026 से, चीनी सरकार ने गर्भनिरोधक उत्पादों, विशेषकर कंडोम पर 13 प्रतिशत वैल्यू एडेड टैक्स (VAT) लगाने का निर्णय लिया है। इस कदम को लोग अनौपचारिक रूप से 'कंडोम टैक्स' के नाम से पुकार रहे हैं। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य नागरिकों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करना है, क्योंकि चीन गंभीर जनसंख्या संकट का सामना कर रहा है।


जनसंख्या संकट का इतिहास

चीन की जनसंख्या समस्या कोई नई बात नहीं है। 1980 से 2015 तक, देश ने सख्त 'एक बच्चा नीति' का पालन किया, जिसके तहत अधिकांश परिवारों को केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति थी। यह नीति जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए लागू की गई थी, लेकिन इसके परिणामस्वरूप जन्म दर में भारी गिरावट आई। 2016 में, चीन ने प्रति परिवार दो बच्चों की अनुमति दी और 2021 में इसे बढ़ाकर तीन कर दिया। हालांकि, तब तक सामाजिक आदतें पहले ही बदल चुकी थीं। आज, कई युवा जोड़े बच्चे न पैदा करने का विकल्प चुन रहे हैं।


चीन की श्रम शक्ति में कमी

'दुनिया की फैक्ट्री'


यह गिरावट चिंताजनक है क्योंकि चीन की कामकाजी उम्र की जनसंख्या तेजी से घट रही है। यह देश, जो कभी सस्ते श्रम के कारण 'दुनिया की फैक्ट्री' के नाम से जाना जाता था, अब श्रम की कमी का सामना कर रहा है। 2012 से, 16 से 59 साल के लोगों की संख्या में कमी आ रही है। 2024 तक, चीन की लगभग 22 प्रतिशत जनसंख्या 60 साल से ऊपर होगी। 2035 तक, बुजुर्गों की संख्या 400 मिलियन तक पहुंच सकती है। इसका अर्थ है कम श्रमिक, उत्पादन लागत में वृद्धि, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव, और धीमी अर्थव्यवस्था। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन 'अमीर होने से पहले बूढ़ा' हो रहा है।


भारत पर प्रभाव

भारत पर क्या होगा असर?


यह संकट केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा। चूंकि Apple और Samsung जैसे वैश्विक ब्रांड चीन में बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं, इसलिए बढ़ती श्रम लागत से उत्पादन खर्च में वृद्धि हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप, स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उत्पाद 2026 में महंगे हो सकते हैं। श्रम की कमी से उत्पादन धीमा हो सकता है, जिससे डिलीवरी में देरी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आ सकती है, जैसा कि कोविड के दौरान देखा गया था।


भारत का अवसर

हालांकि, भारत के लिए यह स्थिति एक चुनौती और अवसर दोनों है। भारत की जनसंख्या युवा है, जिसकी औसत आयु लगभग 28 वर्ष है, जबकि चीन की औसत आयु लगभग 39 वर्ष है। वैश्विक कंपनियां अब 'चाइना प्लस वन' रणनीति अपना रही हैं और वैकल्पिक उत्पादन स्थलों की तलाश कर रही हैं। फॉक्सकॉन और माइक्रोन जैसी कंपनियां पहले ही भारत में संयंत्र स्थापित कर रही हैं। यदि भारत अपने बुनियादी ढांचे और नीतियों में सुधार करता है, तो वह 2026 तक एक प्रमुख वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में उभर सकता है, जिससे अधिक निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास होगा।


बच्चा न पैदा करने के कारण

बच्चा न पैदा करने का कारण


चीन में बच्चा न पैदा करने का सबसे बड़ा कारण पालन-पोषण का उच्च खर्च है। रिपोर्टों के अनुसार, चीन में 18 साल की उम्र तक एक बच्चे को पालने में लगभग 5.38 लाख युआन (लगभग 76,000 डॉलर) का खर्च आता है। बड़े शहरों में, यह खर्च दस लाख युआन से अधिक हो सकता है। इसके अलावा, लोग नौकरी के दबाव, महंगे आवास, महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं, और खराब कार्य-जीवन संतुलन से जूझ रहे हैं। विशेष रूप से महिलाओं को करियर और परिवार दोनों को संभालने का बोझ उठाना पड़ता है। विवाह दर भी गिर रही है, और 2025 में हाल के वर्षों में शादियों की सबसे कम संख्या दर्ज की गई।