दिल्ली में आरआईसी समिट: वैश्विक राजनीति का नया अध्याय
दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को होने वाली आरआईसी समिट वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। इस समिट में भारत, रूस और चीन के बीच आर्थिक और कूटनीतिक मुद्दों पर चर्चा होगी, जिसमें डॉलर के विकल्प के रूप में अपनी मुद्राओं में व्यापार करने की संभावना भी शामिल है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा और ईरान के राष्ट्रपति का आगमन इस समिट को और भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। क्या यह समिट एशिया के लिए एक नए युग की शुरुआत करेगी? जानें इस समिट के संभावित प्रभावों के बारे में।
Aug 1, 2026, 13:10 IST
दिल्ली में आरआईसी समिट का महत्व
इतिहास यह दर्शाता है कि जब भी दुनिया किसी गंभीर संकट का सामना करती है, तब समाधान की खोज में उसकी नजरें भारत की ओर मुड़ती हैं। 12-13 सितंबर 2026 को दिल्ली में होने वाला कार्यक्रम एक अनोखा दृश्य प्रस्तुत करेगा, जो दशकों से नहीं देखा गया। यह केवल प्रधानमंत्री और राष्ट्रपतियों की एक सामान्य बैठक नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति का एक महत्वपूर्ण मंच है, जहां नया भूगोल और इतिहास लिखा जाएगा। दिल्ली में रूस, भारत और चीन (आरआईसी) का एक बड़ा मंच सजने जा रहा है, जिसके नाम से ही वाइट हाउस और नाटो मुख्यालयों में हलचल मच जाती है। दरअसल, कूटनीति में आरआईसी का नाम वर्षों तक कागजों पर ही रहा, लेकिन 2026 की दिल्ली समिट इसे वास्तविकता में बदलने जा रही है। जब दुनिया की तीन सबसे बड़ी सेनाएं, अर्थव्यवस्थाएं और परमाणु शक्तियां एक साथ बैठकर भविष्य की दिशा तय करेंगी, तो इसका क्या परिणाम होगा? पश्चिम को इस बात का डर है कि ये देश एकजुट होकर डीडोलाइजेशन का हथियार अपने पास रखेंगे।
चीनी राष्ट्रपति का भारत दौरा
यदि दिल्ली में इन तीनों देशों ने डॉलर के विकल्प के रूप में अपनी मुद्राओं में व्यापार को अंतिम रूप दे दिया, तो अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व ढह सकता है। यह एक शक्तिशाली संकेत होगा कि अब दुनिया का नियंत्रण वाशिंगटन में नहीं, बल्कि नई दिल्ली में होगा। इस समिट की सबसे बड़ी खबर है चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत आना। अक्टूबर 2019 में जब वे भारत आए थे, तब माहौल अलग था। लेकिन 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में तनाव ने रिश्तों में कड़वाहट भर दी। अब, पांच साल बाद जिनपिंग का दिल्ली आना एक महत्वपूर्ण घटना है। अक्टूबर 204 के कजान समझौते के बाद से कूटनीतिक वार्ताओं में जो गर्माहट थी, उसका अंतिम चरण अब दिल्ली में होगा। क्या पीएम मोदी और जिनपिंग के बीच होने वाली बातचीत एलएसी पर स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करेगी? यदि भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंधों की नई शुरुआत होती है, तो यह एशिया के लिए एक स्वर्ण युग की शुरुआत हो सकती है, जो पश्चिम के लिए एक बुरा सपना साबित होगा।
नए मुद्दों पर चर्चा
हालांकि इस बार ब्रिक्स की बैठक में पुराने मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी। इस बार तीन नए और संवेदनशील मुद्दों पर विचार होगा। पहला मुद्दा ईरान की शक्ति प्रदर्शन और चाबहार का रास्ता है। ईरान के राष्ट्रपति का दिल्ली आना एक महत्वपूर्ण कदम है। एक ओर इजराइल और अमेरिका के साथ ईरान की स्थिति तनावपूर्ण है, दूसरी ओर भारत के साथ उनका पुराना सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध है। दिल्ली में ईरान के राष्ट्रपति चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित करने की बात करेंगे, जो भारत को मध्य एशिया और रूस तक सीधा रास्ता प्रदान करेगा। दूसरा मुद्दा बांग्लादेश और भारत के बीच संबंधों का है। भारत ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान को बुलाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि BRI केवल बड़े देशों का क्लब नहीं है। तीसरा मुद्दा फिलिस्तीन और मध्य पूर्व का जटिल मामला है, जहां ईरान और यूएई के बीच मतभेद हैं। भारत की भूमिका एक वैश्विक मध्यस्थ के रूप में होगी।
भारत की कूटनीतिक चुनौतियाँ
पीएम मोदी को दोनों पक्षों के बीच सहमति स्थापित करनी होगी ताकि एक साझा घोषणापत्र जारी किया जा सके। जनवरी 2024 में ब्रिक्स के विस्तार पर दुनिया ने तालियां बजाई थीं, लेकिन अब वही विस्तार भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन गया है। ईरान और यूएई के बीच तनाव ब्रिक्स की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक बिना किसी साझा बयान के समाप्त होना एक चेतावनी थी। दुनिया देख रही है कि क्या भारत इन दोनों इस्लामिक देशों को एक मेज पर ला पाएगा। पीएम मोदी के व्यक्तिगत संबंध सऊदी अरब और यूएई के साथ अच्छे हैं, और यदि दिल्ली समिट में दो-राज्य समाधान पर कोई ऐतिहासिक समझौता होता है, तो यह भारत की कूटनीति को वैश्विक मान्यता दिला सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स साझा मुद्रा लाएगा? आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कठिन है, लेकिन एक समाधान एक यूनिट ऑफ अकाउंट हो सकता है, जिससे व्यापार स्वर्ण या अपनी मुद्राओं के एक बास्केट के आधार पर किया जा सके। यदि ऐसा होता है, तो यह वैश्विक आर्थिक संतुलन को बदल सकता है।