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नेपाल और भारत के रिश्तों का इतिहास: संघर्ष और सहयोग

नेपाल और भारत के बीच के संबंधों का इतिहास जटिल और संघर्षपूर्ण रहा है। 2008 में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से, नेपाल ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। माओवादी आंदोलन ने इन संबंधों को प्रभावित किया है, जबकि 1950 की संधि पर नेपाल की असहमति भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। नेपाली नागरिकों की राय भी इस संबंध में महत्वपूर्ण है, जो राजनीतिक स्वार्थों के बीच फंसी हुई है। जानें, नेपाल-भारत संबंधों का भविष्य क्या हो सकता है।
 

नेपाल में लोकतंत्र की शुरुआत

28 मई 2008 को नेपाल ने पहली बार लोकतंत्र का अनुभव किया, जो दशकों की क्रांति के बाद संभव हुआ। 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हुआ, और नेपाल के राज परिवार को नारायणहिटी राजमहल छोड़कर पोखरा जाना पड़ा। उनकी संपत्तियां अब नेपाल की जनता की हो गईं। नेपाल ने कई रक्तरंजित क्रांतियों का सामना किया, लेकिन 2000 का दशक एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। जब तक वीरेंद्र वीर शाह विक्रम राजा थे, तब तक भारत के साथ नेपाल के संबंध अच्छे और शांतिपूर्ण रहे। लेकिन 1 जून 2001 को शाही नरसंहार ने सब कुछ बदल दिया। ज्ञानेंद्र शाह ने 4 जून को राजा का पद संभाला, लेकिन उन्होंने एक ऐसे हिंसक दौर का सामना किया, जो नेपाल ने पहले कभी नहीं देखा।


नेपाल में माओवादी आंदोलन का प्रभाव

नेपाल, जिसे एक शांतिपूर्ण देश माना जाता था, वहां के लोकतंत्र की नींव खून से सनी हुई थी। 1996 से 2006 तक नेपाल ने गृह युद्ध का सामना किया, लेकिन उस दौरान की हिंसा ने सभी को झकझोर दिया। माओवादी, सुरक्षाबल और आम नागरिकों ने इस हिंसा का सामना किया। माओवादी आंदोलन ने रक्तरंजित संघर्ष को जन्म दिया। उम्मीद थी कि जब माओवादी लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आएंगे, तो भारत के साथ संबंध सामान्य होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नेपाल के तेवर कभी नरम तो कभी गरम रहे।


माओवादी सरकारों के दौरान भारत-नेपाल संबंध

ब्रिटिश नेपाली ज्यूरिस्ट प्रोफेसर सूर्या सुबेदी ने 2005 में नेपाल और भारत के संबंधों पर एक अध्ययन किया। इस रिसर्च में बताया गया कि माओवादी नेपाल के साथ कैसे संबंध चाहते हैं। उन्होंने कहा कि नेपाल में हो रही घटनाएं भारत के लिए एक कूटनीतिक संकट बन सकती हैं। भारत को शांतिपूर्ण नेपाल से लाभ होना चाहिए, और नेपाल को अपने बड़े पड़ोसी पर संदेह नहीं करना चाहिए।


1950 की संधि पर नेपाल का दृष्टिकोण

नेपाल भारत की 1950 की संधि को असमान मानता है और इसे पुरानी नीति के तहत दबदबे वाली समझता है। नेपाल भारत से घिरा हुआ है, इसलिए उसे आर्थिक विकास और रोजमर्रा की चीजों के लिए भारत पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत, नेपाल को बिजली प्रदान करता है, लेकिन सीमा विवाद जैसे मुद्दे, जैसे कालापानी, लिपुलेख और महाकाली नदी, विवाद का कारण बनते हैं। नेपाल चाहता है कि 1950 की संधि को बदलकर एक नई संधि की जाए।


भारत-नेपाल संबंधों का भविष्य

नेपाली इतिहासकार प्रेम कुमार ठाकुर का मानना है कि भारत और नेपाल को अपने रिश्तों को नई दिशा में ले जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विवादों का समाधान जल्दी नहीं होगा, लेकिन महाकाली नदी संधि को संतोषजनक तरीके से लागू करना आवश्यक है। दोनों देशों के लिए पारस्परिक संधि जरूरी है।


नेपाली नागरिकों की राय

कपिलवस्तु जिले के विजय कुमार शुक्ल, जो नेपाली कांग्रेस के नेता हैं, ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच संबंध केवल राजनीतिक हैं। मधेसी और पहाड़ी समुदायों के बीच दरारें गहरी हैं। उन्होंने कहा कि मधेसी भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं, जबकि पहाड़ी समुदायों में भारत के प्रति कुछ नकारात्मकता है।


नेपाल का शोक और राजशाही का अंत

राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह भारत के साथ अच्छे रिश्तों के पक्षधर थे। 1 जून 2001 को उनके परिवार पर हुए हमले ने नेपाल में राजशाही का अंत कर दिया। ज्ञानेंद्र शाह के शासन के दौरान भी भारत के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। नेपाल आज भी भारत पर निर्भर है, खासकर ऊर्जा और खाद्य सामग्रियों के लिए।