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नेपाल-तिब्बत सीमा पर विनाशकारी बाढ़ से 903 की मौत, 4200 लापता

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई एक विनाशकारी बाढ़ ने 903 लोगों की जान ले ली है और 4200 से अधिक लोग लापता हैं। बचाव दल दिन-रात काम कर रहे हैं, जबकि चीनी राष्ट्रपति ने राहत कार्यों में तेजी लाने का निर्देश दिया है। जानें इस आपदा के कारण और बचाव कार्यों की स्थिति के बारे में।
 

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी प्राकृतिक आपदा

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई एक अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा ने व्यापक तबाही मचाई है। बर्फ, चट्टान, कीचड़ और मलबे के सैलाब के चलते मरने वालों की संख्या 903 तक पहुँच गई है, जबकि 4,200 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। बचाव दल दिन-रात काम कर रहे हैं, ताकि हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की बंद सुरंगों में फंसे नागरिकों और कर्मचारियों तक पहुँच सकें। यह आपदा नेपाल और चीन (तिब्बत) दोनों देशों के कस्बों और गांवों को पूरी तरह से प्रभावित कर चुकी है.


आपदा का समय और प्रभाव

यह आपदा बुधवार को आई, जब बर्फ और चट्टानों का एक विशाल सैलाब नेपाल और चीन की सीमा के पार फैल गया। ग्लेशियर के टूटने से आई इस बाढ़ ने कई लोगों की जान ले ली है और सैकड़ों लोग लापता हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे लापता लोगों की खोज में तेजी लाएं और बचाव कार्यों को प्राथमिकता दें.


तिब्बत में भी स्थिति गंभीर

तिब्बत में भी इस आपदा का गंभीर प्रभाव पड़ा है, जहाँ चीनी मीडिया ने 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की सूचना दी है.


बचाव कार्यों की स्थिति

नेपाल में आई बाढ़ और भूस्खलन से मरने वालों की संख्या बढ़कर 903 हो गई है, जबकि 4,200 से अधिक लोग लापता हैं। बचाव दल त्रिशूली-3A सहित कई बंद हाइड्रोपावर सुरंगों की तलाशी ले रहे हैं। नेपाल के आपदा प्राधिकरण के अनुसार, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से जुड़े 933 लोग लापता हैं, और बचावकर्मी मलबे को हटाने में जुटे हैं.


नेपाली सेना और विशेषज्ञों की भूमिका

भारतीय और नेपाली विशेषज्ञों की मदद से बचाव दल ने चिलिमे और लांगटांग में हाइड्रोपावर साइटों पर काम किया। मलबे को हटाने के लिए मशीनरी और सैनिक रात भर काम कर रहे हैं। नेपाली सेना के प्रवक्ता राजा राम बस्नेत ने कहा कि मलबे के कारण सुरंग तक पहुँचना कठिन हो रहा है.


वैज्ञानिक अध्ययन और बाढ़ का कारण

नेपाली वैज्ञानिकों की प्रारंभिक स्टडी से पता चला है कि यह बाढ़ रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में हिमस्खलन के कारण आई थी। मलबा लेंडे नदी में गिरा और फिर भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में फैल गया, जिससे पारंपरिक GLOF (ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़) की संभावना खारिज हो गई.


प्रधानमंत्री का बयान

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने इस बाढ़ को "अभूतपूर्व और विनाशकारी प्राकृतिक आपदा" बताया है। बचाव कार्यों में लगभग 21,000 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। रेड क्रॉस का अनुमान है कि 90,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं, और अधिकारी शवों की पहचान करने का कार्य जारी रखे हुए हैं.