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नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत-नेपाल संबंधों में तनाव

नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत-नेपाल संबंधों में तनाव बढ़ गया है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह द्वारा भारतीय सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगाने और पहचान पत्र की अनिवार्यता जैसे कदमों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। इसके अलावा, लिपुलेख दर्रे पर भारत और नेपाल के बीच विवाद भी गहरा गया है। जानें इस जटिल स्थिति के पीछे के कारण और इसके संभावित प्रभाव।
 

भारत-नेपाल संबंधों में खटास

नेपाल में हाल ही में सत्ता परिवर्तन के बाद, जब बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने हैं, तब से भारत के साथ संबंधों में गिरावट आई है। भारत और नेपाल के बीच जो पारिवारिक संबंध थे, उनमें अब बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं। दरअसल, नेपाल के प्रधानमंत्री ने भारतीय सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया है। अब भारत-नेपाल सीमा से 100 रुपये से अधिक का सामान ले जाने पर कस्टम ड्यूटी का भुगतान करना होगा। नेपाल अपने पुराने नियमों को सख्ती से लागू कर रहा है ताकि राजस्व में वृद्धि हो सके.


पहचान पत्र की अनिवार्यता

इसके अलावा, भारत-नेपाल की खुली सीमा पर पहले जैसी सहूलियतें नहीं रहीं। नेपाल सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारतीय नागरिकों के लिए पहचान पत्र अनिवार्य कर दिया है। पिछले हफ्ते से लागू हुए इस नए नियम के चलते बिहार के अररिया जिले के जोगबनी बॉर्डर पर अफरा-तफरी का माहौल देखने को मिला। बिना पहचान पत्र पहुंचे सैकड़ों यात्रियों को नेपाल पुलिस ने सीमा पर ही वापस लौटा दिया।


लिपुलेख दर्रे पर आपत्ति

नेपाल सरकार ने हाल ही में भारत और चीन को लिपुलेख दर्रे से यात्रा कराने पर राजनायिक स्तर पर चेतावनी दी थी। नेपाल का कहना है कि लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी पर उसका अधिकार है और भारत को वहां कोई गतिविधि नहीं करनी चाहिए। हालांकि, भारत ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि लिपुलेख दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग है। भारत नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है और सीमा संबंधी लंबित मुद्दों को संवाद के माध्यम से सुलझाने का इच्छुक है।


नेपाल का असंतोष

नेपाल लिपुलेख दर्रे को अपना मानता है। भारत कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख का उपयोग करता रहा है। नेपाल का दावा है कि ब्रिटिश काल के दौरान 1816 में भारत और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई थी, जो महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर नेपाल को संप्रभुता का अधिकार देती है।


विदेश सचिव का दौरा रद्द

नेपाल के बदलते रवैये को देखते हुए, भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री का नेपाल दौरा रद्द करना पड़ा। उन्हें 11 मई को काठमांडू पहुंचना था। भारत सरकार ने नेपाल की नई बालेंद्र शाह सरकार के साथ बातचीत करने और उसकी प्राथमिकताओं को समझने के लिए इस दौरे की योजना बनाई थी। इस यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों की भविष्य की दिशा तय होने की उम्मीद थी, लेकिन अब यह दौरा टल गया है।


पड़ोसी देशों के साथ तनाव

यह ध्यान देने योग्य है कि भारत के पड़ोसियों के साथ पहले से ही संबंध अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। हाल के वर्षों में बांग्लादेश ने कई बार भारत को चुनौती दी है। मालदीव भी चीन के करीब जा चुका है, हालांकि भारत ने कूटनीतिक प्रयासों से स्थिति को सामान्य किया। ऐसे में नेपाल का नाराज होना भारत के लिए चिंता का विषय है।


चीन की रणनीति

विशेष रूप से, चीन नेपाल को अपने प्रभाव में लाने की कोशिश कर रहा है। चीन नेपाल में भारी निवेश कर रहा है ताकि इसे भारत के खिलाफ रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन भारत लंबे समय से नेपाल को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वास्तव में दिल्ली को घेरने की योजना बनाई जा रही है, क्योंकि भारत का अंतिम पड़ोसी भी अब बागी हो रहा है।