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पाकिस्तान की कूटनीति पर संकट: ईरान-अमेरिका वार्ता में क्या होगा आगे?

पश्चिम एशिया में शांति की नई पहल के बीच पाकिस्तान एक कठिन स्थिति में है। ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा पाकिस्तान अब्राहम समझौते से दूरी बनाए हुए है। रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने स्पष्ट किया है कि इजरायल को मान्यता नहीं दी जाएगी। जानें, अमेरिका के साथ रिश्तों पर इसका क्या असर होगा और सऊदी अरब की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
 

पाकिस्तान की कूटनीति पर संकट


नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में शांति की नई पहल के बीच पाकिस्तान एक कठिन स्थिति में फंस गया है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को कम करने में मध्यस्थता कर रहा इस्लामाबाद अब खुद को एक दुविधा में देख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम और अरब देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है, लेकिन पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव से दूरी बनाए रखी है।


रक्षा मंत्री का स्पष्ट बयान

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कहा है कि इस्लामाबाद ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा जो उसकी विदेश नीति और फलस्तीन के प्रति उसके रुख के खिलाफ हो।


समा टीवी को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देता और अब्राहम समझौते में शामिल होने का कोई सवाल नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर इजरायल यात्रा की अनुमति नहीं है।


फिलिस्तीन के बिना सामान्य रिश्ते असंभव

आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है। जब तक पूर्वी यरूशलम को राजधानी बनाकर एक स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र नहीं बनता, तब तक इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। उन्होंने इजरायल पर भरोसे को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि ऐसे पक्ष के साथ स्थायी समझौता करना कठिन है, जिस पर लगातार संदेह हो।


अमेरिका से रिश्तों में तनाव का खतरा

अब्राहम समझौते 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए थे, जिसमें यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। ट्रंप प्रशासन अब ईरान के साथ संभावित समझौते को भी इसी ढांचे में देख रहा है।


विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान खुलकर विरोध करता है, तो इससे अमेरिका के साथ उसके रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, घरेलू राजनीति, धार्मिक समूहों और फलस्तीन समर्थक जनमत के कारण समर्थन जुटाना भी आसान नहीं होगा।


सऊदी अरब की भूमिका महत्वपूर्ण

यह ध्यान देने योग्य है कि सऊदी अरब ने अब तक इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने को फलस्तीनी समाधान से जोड़ा है। यदि रियाद भविष्य में अब्राहम समझौते की दिशा में बढ़ता है, तो पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। इस बीच, पाकिस्तान चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।


प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की 23 से 26 मई तक चीन यात्रा में दोनों देशों ने साझा भविष्य के निर्माण पर सहमति जताई। पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया में शांति के लिए राष्ट्रपति शी चिनफिंग के प्रस्तावों का समर्थन किया है।