पाकिस्तान की राजनीति में मौलाना फजलुर रहमान का बड़ा बयान: सेना की भूमिका पर उठाए सवाल
मौलाना फजलुर रहमान का सख्त बयान
नई दिल्ली: पाकिस्तान के प्रमुख राजनीतिक नेता मौलाना फजलुर रहमान, जिन्हें 'मौलाना डीजल' के नाम से भी जाना जाता है, ने देश के सैन्य प्रतिष्ठान और सरकार के खिलाफ एक सशक्त मोर्चा खोला है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश की सत्ता का निर्णय सेना के जनरलों के हाथ में नहीं, बल्कि जनता के वोट से होना चाहिए। फजलुर रहमान ने पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक मामलों में बढ़ती दखलंदाजी पर कड़ा ऐतराज जताया।
सेना के हस्तक्षेप पर मौलाना का कड़ा ऐतराज
फजलुर रहमान ने कहा कि सेना का मुख्य कार्य देश की सीमाओं की रक्षा करना है। वे सेना के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन राजनीति में उनकी बढ़ती भूमिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब राजनीतिक नेता सेना की वर्दी नहीं पहन सकते, तो सैन्य अधिकारी राजनीति में हस्तक्षेप करने का अधिकार कैसे पा सकते हैं। उन्होंने सेना से संविधान और लोकतंत्र के दायरे में रहने की अपील की।
मदरसों की सुरक्षा और आंतरिक समस्याएं
JUI-F के प्रमुख ने पाकिस्तान सरकार द्वारा धार्मिक मदरसों की संख्या कम करने और उनके पंजीकरण की नई योजनाओं का विरोध किया। उन्होंने अपने पारंपरिक समर्थकों को एकजुट करते हुए चेतावनी दी कि कोई भी धार्मिक मदरसों को बंद नहीं कर सकता। मौलाना ने खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा और कश्मीर में जन-विरोध पर सेना और सरकार दोनों को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि जब पूरे प्रांत जल रहे हैं, तब सेना आंतरिक सुरक्षा में नाकाम साबित हुई है।
भारत की तुलना और आर्थिक संकट
मौलाना ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति की तुलना भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से की। उन्होंने कहा कि भारत ने आठ दशकों में तरक्की करते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना ली है, जबकि पाकिस्तान का कोई वजूद नहीं रह गया है। उन्होंने सवाल किया कि पाकिस्तान के नेता और सैन्य अधिकारी किस बात पर गर्व महसूस कर रहे हैं। मौलाना फजलुर रहमान का यह बयान पाकिस्तान के राजनीतिक, सुरक्षात्मक और आर्थिक संकट की गंभीरता को उजागर करता है।