पाकिस्तान ने ट्रंप के अब्राहम समझौते के प्रस्ताव को किया ठुकरा, जानें क्यों?
पाकिस्तान का स्पष्ट इनकार
नई दिल्ली: पाकिस्तान ने अमेरिका के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान समेत अन्य देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने और इजरायल को औपचारिक मान्यता देने का आग्रह किया था। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई समझौता उनकी 'मौलिक विचारधाराओं' के खिलाफ होगा।
पाकिस्तान का रुख
ख्वाजा आसिफ ने एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि पाकिस्तान का रुख स्पष्ट है और वह ऐसे किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने इजरायल के साथ बातचीत की संभावनाओं पर भी सवाल उठाए और कहा कि जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ पाकिस्तान कैसे बातचीत कर सकता है।
हमारी मूलभूत विचारधाराओं के खिलाफ
जब ख्वाजा आसिफ से पूछा गया कि क्या पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के बीच अब्राहम समझौते में शामिल होगा, तो उन्होंने कहा, 'व्यक्तिगत रूप से, मुझे नहीं लगता कि हमें किसी ऐसे समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी मूलभूत विचारधाराओं से टकराता हो।'
उन्होंने आगे कहा, 'पाकिस्तान उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकता है जिनके शब्दों पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता?'
यह हमें स्वीकार्य नहीं है
जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिकी विदेश विभाग ने पाकिस्तान सरकार से इस मुद्दे पर संपर्क किया था, तो आसिफ ने उत्तर दिया, 'हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि यह हमें स्वीकार्य नहीं है।'
उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान दुनिया का ऐसा देश है जिसके पासपोर्ट में इजरायल का नाम तक शामिल नहीं है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ इंटरव्यू
ख्वाजा आसिफ के इंटरव्यू का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
अब्राहम समझौते का परिचय
अब्राहम समझौते की शुरुआत 2020 में ट्रंप प्रशासन के दौरान हुई थी। इसका उद्देश्य इजरायल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना था।
इस समझौते पर सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने हस्ताक्षर किए थे, इसके बाद मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए।
ट्रंप की अपील
ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्की और जॉर्डन जैसे कई पश्चिम एशियाई देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने और इजरायल को मान्यता देने का आग्रह किया था।
उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि देशों के लिए इन समझौतों पर हस्ताक्षर करना 'अनिवार्य' होना चाहिए। उनका दावा था कि इससे 'मध्य पूर्व में 5,000 वर्षों में पहली बार सच्ची शक्ति, सामर्थ्य और शांति' स्थापित हो सकती है।
पाकिस्तान की नीति
पाकिस्तान लंबे समय से यह कहता आया है कि इजरायल को मान्यता तभी दी जा सकती है जब फिलिस्तीन मुद्दे का दो-राज्य समाधान स्वीकार किया जाए।
देश के संस्थापक Muhammad Ali Jinnah ने 1947-48 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा फिलिस्तीन के विभाजन का विरोध किया था, और तभी से पाकिस्तान की नीति इजरायल को मान्यता न देने की रही है।
इशाक डार का बयान
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी पहले अब्राहम समझौते में शामिल होने से इनकार किया था। उन्होंने कहा था, 'हम तब तक इजरायल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं जब तक फिलिस्तीन संघर्ष का दो-राज्य समाधान स्वीकार नहीं कर लिया जाता।'
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की सात दशकों पुरानी नीति अपरिवर्तित है।
विदेश कार्यालय का स्पष्टीकरण
इस साल जनवरी में पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता Tahir Andrabi ने भी स्पष्ट किया था कि शांति बोर्ड में शामिल होना अब्राहम समझौते से जुड़ा नहीं है।
उन्होंने कहा था, 'यह एक गलत धारणा है कि शांति बोर्ड में शामिल होना किसी भी तरह से अब्राहम समझौते या इस मुद्दे से संबंधित किसी भी मसौदे से जुड़ा है। पाकिस्तान का रुख अपरिवर्तित है और हम अब्राहम समझौते का हिस्सा नहीं बनेंगे।'