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पाकिस्तान में छोटे प्रांतों का प्रस्ताव: क्या है इसके पीछे की राजनीति?

पाकिस्तान में छोटे प्रांतों के गठन का प्रस्ताव एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। सरकार का दावा है कि इससे शासन व्यवस्था में सुधार होगा, लेकिन विशेषज्ञ इसे खतरनाक मानते हैं। इस योजना के समर्थन और विरोध में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद उभर रहे हैं। जानें इस प्रस्ताव के पीछे की राजनीति और इसके संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं।
 

पाकिस्तान में विभाजन की चर्चा फिर से गरमाई


नई दिल्ली: पाकिस्तान में एक बार फिर विभाजन का मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक हलचलों का कारण बन गया है। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के बाद, वर्तमान सरकार अब प्रशासनिक सुधारों के तहत देश को छोटे प्रांतों में बांटने की योजना बना रही है। सरकार का दावा है कि इससे शासन प्रणाली में सुधार होगा और विकास की गति तेज होगी।


छोटे प्रांतों की वकालत: सरकार का बड़ा कदम

पाकिस्तान के संघीय संचार मंत्री और इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी के अध्यक्ष अब्दुल अलीम खान ने हाल ही में छोटे प्रांतों के गठन का समर्थन किया है। उन्होंने जनता को आश्वासन दिया है कि प्रशासनिक इकाइयों के विभाजन से शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी और सरकारी सेवाएं सीधे आम लोगों तक पहुंचेंगी।


विभाजन की योजना का विवरण

अब्दुल अलीम खान के अनुसार, पाकिस्तान के चार मौजूदा प्रांतों - पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा - को तीन या चार नई प्रशासनिक इकाइयों में बांटने की योजना है। इससे कुल 12 से 16 प्रांत बनने की संभावना है। सरकार का तर्क है कि वर्तमान प्रांतों का आकार बहुत बड़ा है, जिससे विकास दूर-दराज के क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाता।


राजनीतिक समर्थन और विरोध

इस प्रस्ताव ने पाकिस्तान की गठबंधन सरकार में भी मतभेद पैदा कर दिए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार में शामिल IPP और सिंध आधारित MQM-P इस योजना के समर्थन में हैं। MQM-P ने नए प्रांतों के गठन के लिए 28वें संविधान संशोधन के माध्यम से दबाव बनाने की बात की है।


वहीं, बिलावल भुट्टो जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इस प्रस्ताव का विरोध कर रही है। सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने स्पष्ट किया है कि वे सिंध के किसी भी बंटवारे को स्वीकार नहीं करेंगे। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के राष्ट्रवादी संगठनों का मानना है कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास है।


समस्या से ज्यादा संकट की आशंका

राजनीतिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों ने छोटे प्रांतों की योजना को जोखिम भरा बताया है। पूर्व पुलिस प्रमुख सैयद अख्तर अली शाह का कहना है कि पाकिस्तान की असली समस्या प्रांतों की संख्या नहीं, बल्कि कमजोर संस्थाएं और जवाबदेही की कमी है। उनके अनुसार, बिना बुनियादी सुधारों के नए प्रांत बनाना अराजकता को बढ़ावा देगा।


पीआईएलडीएटी के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब ने चेतावनी दी है कि नए प्रांतों का गठन एक महंगा और जटिल प्रक्रिया है। अतीत में भी ऐसे प्रयोगों से जनता की शिकायतें कम होने के बजाय और बढ़ी हैं।


इतिहास और वर्तमान स्थिति का डर

1947 में पाकिस्तान की आजादी के समय कुल पांच प्रांत थे: पूर्वी बंगाल, पश्चिम पंजाब, सिंध, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस और बलूचिस्तान। 1971 के युद्ध के बाद पूर्वी बंगाल बांग्लादेश बन गया। विशेषज्ञों को चिंता है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से चल रहे अलगाववादी आंदोलनों के बीच प्रांतों का विभाजन स्थिति को और बिगाड़ सकता है।