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फ्रांस में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच सुरक्षा कड़ी, रात का कर्फ्यू लागू

फ्रांस में हाल के दिनों में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के चलते सरकार ने सुरक्षा उपायों को कड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने भारी पुलिस बल तैनात करने का आश्वासन दिया है, जबकि रात का कर्फ्यू भी लागू किया गया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को सुनने का वादा किया है, लेकिन हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। जानें इस स्थिति के पीछे के कारण और सरकार की प्रतिक्रिया के बारे में।
 

फ्रांस में सुरक्षा उपायों का कड़ा होना

फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने 24 अक्टूबर को प्रस्तावित नए विरोध प्रदर्शनों से पहले सुरक्षा बलों की तैनाती का आश्वासन दिया है। सरकार ने रात का कर्फ्यू बढ़ा दिया है और सुरक्षा को और सख्त कर दिया है। यह निर्णय जीवन-यापन की बढ़ती लागत और स्कूलों की बिगड़ती स्थिति के कारण कई दिनों तक चले हिंसक प्रदर्शनों के बाद लिया गया है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम तब उठाया गया जब गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज़ ने स्वीकार किया कि प्रशासन ने प्रदर्शनों की गंभीरता को कम करके आंका था, और शनिवार को कुछ शहरों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई थी।


पुलिस कार्रवाई और हिंसा की घटनाएँ

न्याय मंत्री गेराल्ड डारमानिन ने बताया कि सोमवार शाम तक 2,500 से अधिक लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था। हिंसा के दौरान लिमोगेस में एक ऐतिहासिक टाउन हॉल में आग लगा दी गई, जबकि दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में लूटपाट की गई। पेरिस के 'प्लेस डे ला रिपब्लिक' और 'लेस हालेस' शॉपिंग क्षेत्रों में रात का कर्फ्यू लागू है। ल्योन और अन्य शहरों में भी इसी तरह की पाबंदियाँ लगाई गई हैं। सोमवार रात पेरिस और ल्योन में कोई बड़ी घटना न होने के बाद, प्रशासन ने इन उपायों को और सख्त किया है।


राष्ट्रपति का संदेश और प्रदर्शन का कारण

रविवार को अपने संबोधन में, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और दंगा करने वालों के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को सुनेगी, लेकिन हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह विरोध प्रदर्शन सितंबर के मध्य में शुरू हुए, जब पेरिस के बाहरी इलाकों में हाई स्कूल के छात्र और शिक्षक कक्षाओं में अत्यधिक भीड़, स्कूलों की जर्जर स्थिति और शिक्षकों की कमी के खिलाफ सड़कों पर उतरे।


आंदोलन का विस्तार और सरकारी प्रतिक्रिया

बाद में, ट्रेड यूनियनों और 'येलो वेस्ट' कार्यकर्ताओं ने भी इस आंदोलन में भाग लिया। यह आंदोलन अब जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं की खराब स्थिति के खिलाफ एक व्यापक अभियान का रूप ले चुका है। शिक्षा से संबंधित चिंताओं के समाधान के लिए, सरकार ने उन स्कूलों में 3,000 से अधिक वैकल्पिक शिक्षकों की तैनाती का वादा किया है, जहाँ शिक्षकों की कमी है। इसके अलावा, सरकार ने कई सौ नई नियुक्तियों को भी मंजूरी दी है। हालाँकि, बढ़ते वित्तीय दबाव और राजनीतिक मतभेदों के कारण व्यापक सुधारों को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।