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बलूचिस्तान में न्यायपालिका पर BYC की चिंताएं: दबाव और देरी के आरोप

बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) ने बलूचिस्तान की न्यायपालिका में लोगों के विश्वास में कमी को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। कमेटी का आरोप है कि उनके नेताओं से जुड़े मामलों में दबाव और सुनवाई में देरी हो रही है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। BYC ने विशेष रूप से गुलज़ादी बलूच के मामले का उल्लेख किया, जिसमें अदालत पर सज़ा देने के लिए दबाव डाले जाने का आरोप लगाया गया है। इसके अलावा, कमेटी ने यह भी कहा कि आरोपियों को बिना सहमति के सरकारी वकील सौंपे गए हैं।
 

BYC की न्यायपालिका पर चिंता

बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) ने बलूचिस्तान की न्यायपालिका के प्रति लोगों के विश्वास में कमी को लेकर चिंता व्यक्त की है। कमेटी का कहना है कि उनके नेताओं से संबंधित अदालती मामलों में दबाव और लंबी देरी के कारण कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है। BYC ने एक पोस्ट में आरोप लगाया कि चीफ जस्टिस कामरान खान मुलाखैल बलूचिस्तान हाई कोर्ट में ज़मानत की याचिकाओं की सुनवाई कर रहे हैं, जबकि एंटी-टेररिज्म कोर्ट (ATC) और सेशन कोर्ट की कार्यवाही जस्टिस मुहम्मद अली मुबीन और जस्टिस कादिर शाह बुखारी के द्वारा संचालित की जा रही है।


कमेटी के अनुसार, चीफ जस्टिस कथित तौर पर BYC सदस्यों से जुड़े मामलों में निचली अदालतों पर सज़ा सुनिश्चित करने के लिए दबाव बना रहे हैं और हाई कोर्ट में ज़मानत की याचिकाओं में देरी कर रहे हैं। BYC ने यह सवाल उठाया कि निचली अदालतों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है, जब चीफ जस्टिस स्वयं कार्यवाही को प्रभावित कर रहे हैं।


कमेटी ने यह भी कहा कि चीफ जस्टिस की भूमिका निचली अदालतों को बाहरी दबाव से बचाने की होनी चाहिए, न कि खुद ऐसे दबाव का स्रोत बनने की।


गुलज़ादी बलूच का मामला

BYC ने न्यायिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर अपनी चिंताओं के उदाहरण के रूप में गुलज़ादी बलूच के मामले का उल्लेख किया। उनके अनुसार, बेंच ने कई बार संकेत दिया था कि वह बलूच को सज़ा नहीं देना चाहती, लेकिन कथित तौर पर अदालत को सज़ा देने के निर्देश दिए गए थे। BYC ने तर्क किया कि यदि जजों पर सज़ा को लेकर दबाव डाला जा रहा है, तो यह मामला किसी एक केस से कहीं अधिक गंभीर है और न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठाता है।


कमेटी ने यह भी आरोप लगाया कि BYC नेताओं से जुड़े मामलों में आरोपियों की सहमति के बिना सरकार द्वारा नियुक्त वकील दिए गए, जिससे उन्हें अपना बचाव करने के लिए वकील चुनने का अधिकार नहीं मिला।


सुनवाई में देरी और अपील का अधिकार

BYC ने बताया कि डॉ. महरंग बलूच और सिबगतुल्लाह शाहजी को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है और उन्हें अपील करने का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। हालांकि, कमेटी के अनुसार, उनकी अपीलों में काफी देरी हो रही है। संगठन ने यह भी कहा कि BYC नेताओं ने 13 जून से ऐसी सुनवाई का बहिष्कार किया है, जिसे उन्होंने "बिना चेहरे वाली सुनवाई" (faceless trials) कहा।


BYC की पोस्ट के अनुसार, इसके बाद बलूचिस्तान हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसमें इन कार्यवाहियों को समाप्त करने और जस्टिस मुहम्मद अली मुबीन को बदलने का अनुरोध किया गया। कमेटी ने आरोप लगाया कि याचिका पर सुनवाई में बार-बार देरी की जा रही है।