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बांग्लादेश में हिंदू छुट्टियों का विवाद: क्या सरकार ने जानबूझकर किया है भेदभाव?

बांग्लादेश में यूनुस सरकार द्वारा जारी की गई छुट्टियों की सूची में हिंदू त्योहारों को शामिल न करने से विवाद उत्पन्न हो गया है। इस निर्णय ने धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों में असंतोष पैदा किया है। आलोचकों का कहना है कि सरकार जानबूझकर हिंदू समुदाय की भावनाओं की अनदेखी कर रही है। इसके अलावा, भाषा आंदोलन के महत्व को भी नजरअंदाज किया गया है, जिससे इतिहासकारों और शिक्षाविदों में नाराजगी है। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा जा रहा है।
 

बांग्लादेश में धार्मिक छुट्टियों पर विवाद


नई दिल्ली: बांग्लादेश में यूनुस सरकार के तहत हिंदू समुदाय के अधिकारों और उनकी धार्मिक छुट्टियों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। हाल ही में सरकार ने 2026 के लिए आधिकारिक छुट्टियों की सूची जारी की, जिसमें हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहार जैसे सरस्वती पूजा, बुद्ध पूर्णिमा, जन्माष्टमी और महालया को शामिल नहीं किया गया है। इसके साथ ही मई दिवस पर भी अवकाश नहीं दिया गया है, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक असंतोष उत्पन्न हुआ है।


सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन दिनों में सभी स्कूल और शैक्षणिक संस्थान खुले रहेंगे। आलोचकों का कहना है कि यह कदम हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं की अनदेखी करने का संकेत है। रमजान और ईद-उल-फितर के लिए छुट्टियां दी जाती हैं, लेकिन इनकी संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कम हो गई है।


इतिहास की अनदेखी

छुट्टियों की इस सूची पर आरोप लगाया जा रहा है कि यूनुस सरकार बांग्लादेश के इतिहास से भाषा आंदोलन के महत्व को मिटाने का प्रयास कर रही है। पिछले डेढ़ वर्षों में सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए हैं, जो देश के इतिहास, विशेषकर लिबरेशन वॉर और बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान के योगदान को प्रभावित करते हैं। इस साल भी 21 फरवरी को मनाए जाने वाले भाषा दिवस को सूची में शामिल नहीं किया गया है।


सरकारी सूत्रों का कहना है कि 21 फरवरी इस साल शनिवार को है और चूंकि बांग्लादेश में शुक्रवार और शनिवार को पहले से ही साप्ताहिक अवकाश होता है, इसलिए इसे छुट्टी के रूप में अलग से नहीं दर्शाया गया। हालांकि, 2025 में भी 21 फरवरी शुक्रवार था और तब इसे भाषा दिवस के रूप में छुट्टी की सूची में रखा गया था।


इतिहासकारों की प्रतिक्रिया

इस निर्णय पर शिक्षाविद और इतिहासकारों ने नाराजगी व्यक्त की है। विद्वान पवित्र ने कहा, “यह न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह बंगाली भाषा और उसके इतिहास के प्रति पूरी तरह से अनभिज्ञता का परिचायक है। 21 फरवरी 1952 को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के छात्रों ने बंगाली को राज्य की भाषा बनाने की मांग को लेकर आंदोलन किया था। उस आंदोलन में बरकत, सलाम, रफीक और जब्बार जैसे छात्रों ने अपनी जान गंवाई। यह भाषा आंदोलन बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक था।”


विद्वानों का कहना है कि यह आंदोलन केवल एक छात्र आंदोलन नहीं था, बल्कि यह बांग्लादेश की सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है। ऐसे में सरकार द्वारा इसे अनदेखा करना देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए चिंता का विषय है।


सामाजिक प्रतिक्रिया और विवाद

इस निर्णय के बाद देश में धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के बीच नाराजगी बढ़ी है। सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सरकार जानबूझकर हिंदू त्योहारों और भाषा दिवस को सूची से बाहर रखकर सांस्कृतिक असंतोष पैदा कर रही है। आलोचकों का मानना है कि यह कदम लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक दृष्टि से असंवैधानिक है।


विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस तरह के विवादास्पद निर्णय लेने से पहले सभी समुदायों की भावनाओं और ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखना चाहिए। इससे न केवल धार्मिक सहिष्णुता बढ़ेगी, बल्कि इतिहास की सच्चाई भी सुरक्षित रहेगी।