भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग पर चर्चा
भारत-जापान रक्षा सहयोग की नई दिशा
भारत और जापान ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए आपसी रक्षा तकनीकी साझेदारी, संयुक्त सैन्य अभ्यास और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर विचार किया। यह महत्वपूर्ण बैठक नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और जापान की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) के सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई, जिसका नेतृत्व तारो कोनो कर रहे थे। रक्षा मंत्रालय ने इस बैठक की जानकारी देते हुए X पर लिखा, "रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 22 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में जापान की LDP के इंटरनेशनल कोऑपरेशन के डायरेक्टर जनरल तारो कोनो से मुलाकात की। उन्होंने इंडो-पैसिफिक में शांति और स्थिरता के लिए आपसी रक्षा तकनीकी सहयोग, संयुक्त अभ्यास और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने पर सार्थक चर्चा की।"
हालांकि, बेंच ने इस मामले पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस बागची ने कहा कि कथित गलत इस्तेमाल के विभिन्न मामलों के आधार पर उस कानून पर पुनर्विचार नहीं किया जा सकता, जिसे पहले ही तीन जजों की बेंच ने सही ठहराया है। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतें उन मामलों में हस्तक्षेप कर सकती हैं जहां कानूनी प्रावधानों का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल हुआ हो।
PIL खारिज, SC/ST एक्ट की वैधता पर सवाल
इसके बाद PIL को खारिज कर दिया गया। याचिका में SC/ST एक्ट के कई प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि ये प्रावधान आर्टिकल 14, 21 और 22 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। याचिका में नागरिकों की जान, सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी, साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा गया था कि एक्ट के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल न हो।
सैनी और 18 अन्य लोगों द्वारा दायर इस याचिका में एक्ट की धाराओं 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18A और 19 को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने FIR दर्ज करने और इस कानून के तहत आरोपी लोगों की गिरफ्तारी के मामले में सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देने की मांग की है।
धारा 18A पर विशेष ध्यान
याचिका में विशेष रूप से धारा 18A को चुनौती दी गई है। इसे 2018 के संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था और इसमें प्रावधान है कि एक्ट के तहत FIR दर्ज करने के लिए किसी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के लिए भी किसी पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने 'सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में झूठे मामलों में फंसाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बाद में किए गए कानूनी संशोधन ने उन सुरक्षा उपायों को कमजोर कर दिया।