भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल समझौते पर नई बातचीत की संभावना
गंगा जल समझौते पर बातचीत का नया दौर
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल को लेकर बातचीत एक बार फिर तेज हो सकती है। बांग्लादेश ने 1996 में हुए गंगा जल समझौते की अवधि समाप्त होने से पहले नई संधि में गारंटी क्लॉज जोड़ने की मांग की है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी एनी ने कहा कि यदि आवश्यक हुआ, तो उनका देश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाने के लिए तैयार है। वर्तमान गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है, जो हर साल 1 जनवरी से 31 मई तक गंगा के पानी के बंटवारे से संबंधित है। इस अवधि में नदी में पानी का स्तर सामान्यतः कम रहता है.
पानी के बंटवारे का मौजूदा फॉर्मूला
वर्तमान समझौते में नदी के प्रवाह के अनुसार पानी बांटने का एक फॉर्मूला निर्धारित किया गया है। यदि पानी का प्रवाह 70 हजार क्यूसेक या उससे कम है, तो दोनों देशों को आधा-आधा पानी मिलता है। 70 से 75 हजार क्यूसेक के बीच बहाव होने पर बांग्लादेश को 35 हजार क्यूसेक पानी दिया जाता है। जबकि 75 हजार क्यूसेक या उससे अधिक बहाव होने पर भारत को 40 हजार क्यूसेक पानी मिलता है और शेष पानी बांग्लादेश को दिया जाता है। बांग्लादेश का कहना है कि मौजूदा संधि में पानी के बंटवारे की व्यवस्था तो है, लेकिन न्यूनतम मात्रा में पानी मिलने की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं है। इसलिए, वह नई संधि में ऐसा प्रावधान चाहता है, जिससे सूखे के समय भी एक निश्चित मात्रा में पानी मिलने की व्यवस्था हो सके.
फरक्का बैराज से जुड़ा विवाद
गंगा जल को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद की जड़ फरक्का बैराज से भी जुड़ी हुई है। भारत ने पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज का निर्माण किया था, जिसका उद्देश्य गंगा के पानी का कुछ हिस्सा हुगली नदी की ओर भेजना था। इससे कोलकाता बंदरगाह में जमा गाद को कम करने में मदद मिलती है। बांग्लादेश का कहना है कि पानी के प्रवाह में कमी से वहां सिंचाई, खेती, मछलियों और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी कारण से, नई संधि में वह पानी की गारंटी और विवाद की स्थिति में जिम्मेदारी तय करने वाला प्रावधान चाहता है.