भारत और श्रीलंका के बीच चीन की बढ़ती भूमिका
श्रीलंका और भारत के संबंधों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
पॉवरफुल की परिभाषा को ठेठ देशी अंदाज में समझें तो इसका मतलब है कि न केवल अपने घर को अच्छे से चलाना, बल्कि पूरे मोहल्ले में भी अपनी पहचान बनाना। यही सिद्धांत देशों पर भी लागू होता है। भारत की हमेशा से यह आकांक्षा रही है कि उसे दक्षिण एशिया में सम्मान मिले और एक शक्तिशाली देश के रूप में देखा जाए। यह इच्छा उसकी विदेश नीति को आकार देती है। भारत के पड़ोसी श्रीलंका के साथ संबंधों को समझने के लिए एक अलग एपिसोड की आवश्यकता होगी। संक्षेप में, तमिलनाडु से जाफना मोटरबोट द्वारा कुछ घंटों में पहुंचा जा सकता है। दोनों देशों के बीच सदियों पुराना संबंध है। जब भारत और श्रीलंका दोनों ही ब्रिटिश उपनिवेश थे, तब भारत से तमिल समुदाय के लोग श्रीलंका में बस गए। आधुनिक समय में, इसी समुदाय के कारण भारत और श्रीलंका का भविष्य आपस में जुड़ा हुआ है। राजीव गांधी द्वारा श्रीलंका में शांति सेना भेजने से लेकर लिट्टे समर्थकों द्वारा उनकी हत्या तक, दोनों देशों के बीच का संबंध गहरा और पुराना है। आज भी तमिलनाडु में हजारों श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी निवास करते हैं। 2007 में सेना भेजने के बाद से भारत लगातार श्रीलंका की सहायता करता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में श्रीलंका ने भारत की बजाय चीन की ओर रुख किया है।
चीन और श्रीलंका के बीच बढ़ती नजदीकी
श्रीलंका और भारत के बीच संबंध दशकों से मजबूत रहे हैं। हर साल इन संबंधों में वृद्धि देखने को मिली है। 2007 में जब श्रीलंका की सेना ने तमिल उग्रवादियों के खिलाफ अभियान तेज किया, तब भी भारत ने उसका समर्थन किया। लेकिन इस दौरान चीन ने भी श्रीलंका पर ध्यान केंद्रित किया। 2005 में श्रीलंका के राष्ट्रपति बने महिंद्रा राजपक्षे का झुकाव चीन की ओर अधिक था। उन्होंने अपने क्षेत्र हंबनटोटा में एक बंदरगाह बनाने की योजना बनाई। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने पहले भारत की ओर देखा, लेकिन भारतीय कंपनियों की रुचि न दिखाने पर राजपक्षे ने चीन का रुख किया। चीन के बैंकों ने उन्हें उदारता से ऋण दिया। इसके बाद, श्रीलंका ने अपनी वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए भी चीन से कर्ज लिया। 2014 में शी जिनपिंग ने श्रीलंका का दौरा किया। देखते ही देखते, श्रीलंका पर इतना कर्ज चढ़ गया कि उसे ब्याज चुकाने के लिए भी पैसे नहीं बचे। कर्ज न चुकाने के कारण, श्रीलंका को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल की लीज पर चीन को सौंपना पड़ा।
चीन का नौसेना के अड्डे बनाने का इरादा
श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति इसे विशेष बनाती है। हिंद महासागर में इसकी स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन यहां अपना वर्चस्व स्थापित करके समुद्री मार्ग को अपने मालवाहक जहाजों के लिए सुरक्षित बनाना चाहता है। इसके साथ ही, चीन ने श्रीलंका में अपने नौसेना के अड्डे बनाने की योजना बनाई है। ये इरादे भारत के लिए एक बड़ा खतरा बन सकते हैं। चीन ने श्रीलंका में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें शी जिनपिंग के ड्रीम प्रोजेक्ट बीआरआई शामिल हैं। इन परियोजनाओं के लाभ न मिलने के कारण श्रीलंका चीन के कर्ज के बोझ तले दब गया है।
कोलंबो पोर्ट सिटी का विकास
चीन की कंपनी 'चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी' (CCCC) के साथ 1.4 अरब डॉलर के FDI समझौते के तहत, श्रीलंका ने कोलंबो के कमर्शियल हार्बर के पास समुद्र की तलहटी से 269 हेक्टेयर ज़मीन तैयार की। ड्रेजिंग के खर्च के बदले, चीनी सरकारी ठेकेदार को 116 हेक्टेयर ज़मीन दी गई, जो ज्यादातर 99 साल की लीज़ पर थी। इस प्रोजेक्ट की कानूनी स्थिति ने सरकारी स्तर पर तनाव बढ़ा दिया। श्रीलंका की संसद ने एक कानून पास करके एक स्वायत्त 'स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन' (SEZ) बनाया, जिसे राष्ट्रपति के अधीन एक कमीशन चलाता है। इस कानून में सिंगल-विंडो मंज़ूरी, बड़े राष्ट्रीय टैक्स नियमों से छूट, ऑफशोर फाइनेंशियल स्टेटस और तय विदेशी मुद्राओं में लेन-देन की सुविधा दी गई। आलोचकों और श्रीलंकाई विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में इस बिल को चुनौती दी। उनका तर्क था कि यह कानून असंवैधानिक है और देश के सामान्य कानूनों के दायरे से बाहर है।