भारत की कृषि नीतियों पर अमेरिका और अन्य देशों की चिंता
जिनेवा में भारत की कृषि नीतियों पर अमेरिका और अन्य विकसित देशों ने चिंता जताई है। अमेरिका ने भारत की संरक्षणवादी नीतियों को वैश्विक व्यापार के लिए खतरा बताया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य और निर्यात पाबंदियों पर उठे सवालों ने भारत के किसानों के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। क्या भारत अपनी नीतियों में बदलाव करेगा? जानें पूरी कहानी में।
Jul 29, 2026, 16:06 IST
भारत के किसानों का भविष्य: जिनेवा में उठे सवाल
क्या जिनेवा के बंद कमरों में भारत के किसानों के भविष्य को लेकर कोई साजिश चल रही है? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि एक ओर भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मंच पर भारत को घेरने की कोशिशें हो रही हैं। अमेरिका ने भारत की कृषि नीतियों को खतरनाक और व्यापार में बाधा डालने वाला करार दिया है। चावल, गेहूं, चीनी और यहां तक कि प्याज जैसे खाद्य पदार्थों पर वैश्विक नजरें हैं। हाल ही में जिनेवा में भारत की व्यापार नीति की समीक्षा की गई, जो हर कुछ वर्षों में होती है। लेकिन इस बार का माहौल सामान्य नहीं था। जैसे ही भारत का नंबर आया, अमेरिका ने मोर्चा संभाल लिया। अमेरिका के प्रतिनिधि ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की संरक्षणवादी नीतियां वैश्विक व्यापार के लिए खतरा हैं। अमेरिका की मुख्य चिंता भारत की सब्सिडी को लेकर है, जिसका तर्क है कि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में फसलों की कीमतें प्रभावित होती हैं। विशेष रूप से चावल और गेहूं पर अमेरिका ने अपनी आपत्ति जताई है। उन्होंने भारत से अपनी नीतियों को पारदर्शी बनाने और उन गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने का आग्रह किया जो विदेशी कंपनियों के लिए भारत में प्रवेश को कठिन बनाती हैं।
अन्य देशों की चिंताएं और भारत की नीतियां
इस बैठक में केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि कई अन्य विकसित देशों ने भी भारत को कटघरे में खड़ा किया। बैठक की अध्यक्षता कर रही एंबेसडर नेला पेपे ने उन मुद्दों की सूची पेश की जिन पर दुनिया को आपत्ति है। सबसे बड़ा मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) है। कई देशों का सवाल है कि भारत सरकार एमएसपी कैसे तय करती है? उनका आरोप है कि एमएसपी के कारण भारतीय किसान वैश्विक कीमतों की चिंता किए बिना उत्पादन करते हैं, जिससे बाजार में असंतुलन पैदा होता है। इसके अलावा, भारत के सार्वजनिक भंडारण प्रणाली (पीडीएस) पर भी सवाल उठाए गए हैं। देशों का कहना है कि भारत खाद्य सुरक्षा के नाम पर अनाज का भंडारण करता है और फिर उसे वैश्विक बाजार में सस्ते दामों पर बेचता है, जिससे अन्य देशों के किसानों को नुकसान होता है। हाल के समय में भारत ने गेहूं, चावल और प्याज के निर्यात पर कई पाबंदियां लगाई हैं। जब भारत में कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार अपनी जनता की रक्षा के लिए निर्यात रोक देती है, लेकिन डब्ल्यूटीओ में इसे व्यापारिक विरोधी कदम माना गया है।
भारत की नीतियों पर वैश्विक प्रतिक्रिया
सदस्य देशों का कहना है कि भारत की ये नीतियां अनिश्चित हैं, जिससे विदेशी खरीदारों को यह नहीं पता होता कि कब भारत निर्यात बंद कर देगा। इससे अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। इसके अलावा, भारत की आयात लाइसेंसिंग और टैरिफ दरों पर भी सवाल उठाए गए। सरल शब्दों में, दुनिया चाहती है कि भारत अपने दरवाजे विदेशी कृषि उत्पादों के लिए पूरी तरह से खोल दे, लेकिन भारत अपने किसानों के हितों की रक्षा के लिए ऐसा नहीं करेगा। एक और तकनीकी शब्द जो इस बैठक में चर्चा में आया, वह था एसपीएस, जो खाद्य सुरक्षा और कीटनाशकों से संबंधित है। कई देशों ने आरोप लगाया है कि भारत के पास वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन की कमी है। उनका कहना है कि भारत ने खाद्य और कीटनाशकों के जो मानक तय किए हैं, उनमें पारदर्शिता की कमी है। इन सभी का मानना है कि इन कड़े नियमों का उपयोग भारत विदेशी सामान को रोकने के लिए एक हथियार के रूप में करता है।