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भारत-रूस का ऐतिहासिक सैन्य समझौता: क्या है RELOS का महत्व?

भारत और रूस ने एक ऐतिहासिक सैन्य समझौता किया है, जिसे 'इंडो-रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट' कहा जाता है। इस समझौते के तहत, दोनों देश एक-दूसरे की भूमि पर सैनिकों, युद्धपोतों और सैन्य विमानों की तैनाती कर सकेंगे। यह कदम वैश्विक सुरक्षा चिंताओं के बीच दोनों देशों के बीच विश्वास को और मजबूत करेगा। जानें इस समझौते के प्रमुख प्रावधान और इसके सामरिक महत्व के बारे में।
 

नई ऊंचाइयों पर भारत-रूस की दोस्ती


नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच की पुरानी मित्रता ने एक बार फिर एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया है। ईरान और होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच, इन दोनों देशों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जो अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के लिए चिंता का विषय बन सकता है। अब, दोनों देश एक-दूसरे की भूमि पर सैनिकों, युद्धपोतों और सैन्य विमानों की तैनाती कर सकेंगे।


RELOS समझौता: क्या है इसकी विशेषताएँ?

भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने वाला 'इंडो-रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट' अब पूरी तरह से लागू हो चुका है। इस समझौते के तहत, दोनों देश एक-दूसरे के क्षेत्र में 3000 सैनिक, 10 सैन्य विमान और 5 युद्धपोत तैनात कर सकेंगे। यह कदम वैश्विक सुरक्षा चिंताओं के इस अभूतपूर्व दौर में दोनों देशों के बीच विश्वास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।


यह समझौता फरवरी 2025 में हस्ताक्षरित हुआ था और 12 जनवरी से प्रभावी है। रूस ने इसे दिसंबर 2025 में औपचारिक रूप से मंजूरी दी थी। इस समझौते के अनुसार, दोनों देशों को एक समय में अधिकतम 3000 सैनिक, 10 सैन्य विमान और 5 युद्धपोत तैनात करने की अनुमति होगी। यह तैनाती पांच वर्षों के लिए होगी, जिसे आपसी सहमति से बढ़ाया जा सकता है।


सुविधाओं का विस्तार

इस समझौते के लागू होने से दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सैन्य सहयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। विशेष रूप से, भारत के पास मौजूद रूसी सैन्य उपकरणों की सर्विसिंग और लंबी अवधि की तैनाती में यह समझौता महत्वपूर्ण साबित होगा। इसके अलावा, यह संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और मानवीय सहायता अभियानों को भी कवर करता है।


RELOS समझौता केवल सैन्य तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लॉजिस्टिक सहयोग का भी विस्तृत प्रावधान है। इसके तहत मेजबान देश युद्धपोतों को बंदरगाह सेवाएं, मरम्मत सुविधाएं, पानी, भोजन और अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराएगा। सैन्य विमानों के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल, उड़ान से जुड़ी सूचनाएं, नेविगेशन सिस्टम का उपयोग, पार्किंग और सुरक्षा जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।


सामरिक साझेदारी को मिलेगी मजबूती

इस समझौते के तहत, दोनों देशों को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, जैसे एयरबेस और बंदरगाहों, तक पारस्परिक पहुंच मिलेगी। इससे भारत को रूस के रणनीतिक आर्कटिक क्षेत्र के ठिकानों तक पहुंच प्राप्त होगी, जबकि रूस को भारत के सैन्य ढांचे का व्यापक उपयोग करने का अवसर मिलेगा। यह समझौता संयुक्त प्रशिक्षण, आपदा राहत और संभावित संयुक्त अभियानों के लिए भी मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे दोनों देशों की सामरिक साझेदारी और मजबूत होगी।