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मध्य एशिया में रूस और उज़्बेकिस्तान का सैन्य अभ्यास: सुरक्षा के नए खतरे

रूस और उज़्बेकिस्तान का संयुक्त सैन्य अभ्यास मध्य एशिया में सुरक्षा के नए खतरे को उजागर करता है। इस अभ्यास के पीछे आतंकवाद, क्षेत्रीय दबदबा और आधुनिक युद्ध तकनीकों का परीक्षण जैसे महत्वपूर्ण कारण हैं। भारत की विकास और मित्रता की रणनीति इस स्थिति में एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। जानें कैसे चाबहार पोर्ट भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक पहुँचने में मदद कर रहा है।
 

मध्य एशिया में सुरक्षा की नई चुनौतियाँ

क्या मध्य एशिया में एक नए खतरे का आगाज़ होने वाला है? हालिया रिपोर्टों के अनुसार, 20 से 27 अक्टूबर के बीच रूस और उज़्बेकिस्तान की सेनाएँ तरमेज ट्रेनिंग सेंटर में एक बड़े संयुक्त सैन्य अभ्यास का आयोजन कर रही हैं। यह स्थान अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा के निकट स्थित एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस अभ्यास में केवल पैदल सैनिक ही नहीं, बल्कि अत्याधुनिक लड़ाकू हेलीकॉप्टर, जमीनी गश्त के लिए रोबोटिक युद्ध प्रणाली और पहाड़ी क्षेत्रों में निगरानी के लिए ड्रोन भी शामिल किए गए हैं। इसका मतलब है कि रूस और उज़्बेकिस्तान अपनी सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करने में जुटे हैं।


इस स्थिति के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, आतंकवादियों के घुसपैठ का खतरा। अफगानिस्तान में सक्रिय चरमपंथी समूह और छोटे हथियारों से लैस गिरोह उज्बेकिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। दूसरा, क्षेत्र में रूस का प्रभाव। रूस को इस क्षेत्र का प्रमुख माना जाता है, और ताजाकिस्तान में उसके सैन्य ठिकाने पहले से मौजूद हैं। उज़्बेकिस्तान के साथ इस अभ्यास के जरिए, पुतिन यह संदेश देना चाहते हैं कि मध्य एशिया में रूस का वर्चस्व बना रहेगा। तीसरा, आधुनिक युद्ध तकनीकों का परीक्षण। कठिन और दुर्गम इलाकों में मानव सैनिकों की तुलना में ड्रोन और रोबोट अधिक प्रभावी होते हैं।


रूस यहाँ अपनी नई तकनीकों का वास्तविक परीक्षण कर रहा है। अब इस कहानी के दिलचस्प मोड़ पर आते हैं। जहां रूस सैन्य शक्ति के माध्यम से सीमाओं को सील कर रहा है, वहीं भारत की रणनीति पूरी तरह से भिन्न है। भारत ने अफगानिस्तान में विकास और मित्रता के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की है। सलमा डैम से लेकर काबुल की संसद और टरंज डेलाराम हाईवे तक, भारत ने अफगान लोगों का विश्वास जीता है। संकट के समय में, भारत ने लगातार गेहूं, दवाइयाँ और राहत सामग्री भेजकर यह साबित किया है कि वह सच्चा मित्र है।


अब सवाल यह है कि क्या भारत और रूस की सोच समान है? हाँ और नहीं। दोनों ही यह नहीं चाहते कि अफगानिस्तान की भूमि का उपयोग आतंकवाद फैलाने के लिए किया जाए। लेकिन रूस का ध्यान अधिकतर सैन्य गठबंधनों पर है, जबकि भारत व्यापार, कनेक्टिविटी और मानवीय संबंधों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। यहाँ ईरान का चाबहार पोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चाबहार के माध्यम से, भारत बिना पाकिस्तान पर निर्भर हुए सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक पहुँच बना रहा है। यदि क्षेत्र में शांति बनी रहती है, तो यह चाबहार मार्ग पूरे एशिया की अर्थव्यवस्था को बदल सकता है। इस प्रकार, रूस का यह सैन्य अभ्यास स्पष्ट करता है कि मध्य एशिया में सुरक्षा की स्थिति अत्यंत संवेदनशील है।