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यमन में ड्रोन युद्ध: सऊदी अरब की सैन्य चुनौतियाँ और आर्थिक दुष्प्रभाव

यमन में चल रहे संघर्ष में सऊदी अरब को कई सैन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सस्ते ड्रोन के खिलाफ महंगी मिसाइलों का उपयोग और अमेरिका से सैन्य सहायता की मांग, सऊदी अरब के लिए एक गंभीर आर्थिक संकट का कारण बन रही है। जानें इस जटिल स्थिति के पीछे की सच्चाई और इसके संभावित परिणाम।
 

सऊदी अरब और यमन के बीच का सैन्य संघर्ष

एक ऐसे संघर्ष में, जहां आसमान से आने वाले 15 से 20 हजार डॉलर के सस्ते ड्रोन को नष्ट करने के लिए जमीन से 40 लाख डॉलर की मिसाइलें दागी जाती हैं, यह एक बड़ा सैन्य विरोधाभास है। यदि मिसाइल चूक जाती है, तो अरबों डॉलर की रिफाइनरी को नुकसान होता है, और यदि यह ड्रोन से टकराती है, तो आर्थिक चोट उसी पर पड़ती है जिसने मिसाइल दागी है। यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा सैन्य विरोधाभास है। एक ओर, दुनिया का आठवां सबसे बड़ा सैन्य बजट वाला देश, पश्चिमी तकनीक से लैस एफ15 लड़ाकू विमानों और पेट्रियट मिसाइल शील्ड के साथ है। दूसरी ओर, यमन में एक विद्रोही समूह है, जिसके पास कोई पारंपरिक वायु सेना नहीं है, लेकिन 2000 किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें हैं।


यमन के अंसारुल्लाह हूती लड़ाके सीधे रियाद के एयरपोर्ट और तेल प्रतिष्ठानों पर मिसाइलों से हमला कर रहे हैं। सऊदी शहजादे के लिए वाशिंगटन से मदद मांगना अपने हाथों में बारूद का गोला थामने जैसा साबित हो रहा है। इंटरनेशनल थिंक टैंक के वरिष्ठ विश्लेषक त्रिता पारसी ने हाल ही में कहा कि सऊदी अरब बुरे विकल्पों के जाल में फंसा हुआ है। यदि सऊदी अरब अमेरिका से सैन्य सहायता मांगेगा, तो वाइट हाउस इसके बदले एक बड़ी शर्त रखेगा।


प्रिंस सलमान यदि अमेरिकी लड़ाकू विमानों को अपने एयर स्पेस का उपयोग करने की अनुमति देते हैं, तो इसका मतलब होगा ईरान के साथ खुली जंग। तेहरान तुरंत अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का रुख रियाद और अरामको की रिफाइनरियों की ओर मोड़ देगा। यमन में हूतियों का रुख इतना आक्रामक हो चुका है कि वे ईरान की सलाह को भी नजरअंदाज कर रहे हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य अपने ऊपर लगे सभी ब्लॉकेट को तोड़ना है।


सऊदी अरब की स्थिति इतनी गंभीर है कि उसके पास केवल बुरे विकल्प बचे हैं। सऊदी अरब और यमन के बीच चल रहा संघर्ष तब और बढ़ गया जब सऊदी ने कुछ महीने पहले सनाई एयरपोर्ट पर बमबारी शुरू की। इस स्थिति की जड़ डोनाल्ड ट्रंप और इसराइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू की गई बेवजह की जंग है, जिसने पूरे मध्य पूर्व को संकट में डाल दिया है।


हालांकि सऊदी अरब की आर्थिक स्थिति मजबूत है, लेकिन वह सस्ते ड्रोन के खिलाफ करोड़ों डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइलें दागकर अपनी अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक तनाव में नहीं रख सकता। हथियारों की गुणवत्ता और तकनीक में सऊदी अरब हूतियों से आगे है, लेकिन युद्ध के मैदान में केवल हथियारों की कीमत मायने नहीं रखती। हूतियों ने यह साबित कर दिया है कि एक गैर-राज्य समूह भी आधुनिक सेनाओं को रणनीतिक गतिरोध में डाल सकता है। सऊदी अरब हवाई हमलों से हूती के लॉन्च पैड को नष्ट कर सकता है, लेकिन जब तक ईरान से आने वाली सप्लाई लाइन पूरी तरह से नहीं कट जाती और जमीन पर राजनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक केवल बमबारी से इस खतरे को खत्म नहीं किया जा सकता।