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सऊदी अरब का मक्का रक्षा समझौता: चुनौतियाँ और संभावनाएँ

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौता हाल ही में यमन के हूती विद्रोहियों के हमले के बाद गंभीर परीक्षण में है। इस लेख में समझौते की चुनौतियों, पाकिस्तान और तुर्की की प्रतिक्रियाओं, और अमेरिका की भूमिका पर चर्चा की गई है। क्या यह समझौता अपने उद्देश्यों में सफल होगा? जानें इस लेख में।
 

मक्का रक्षा समझौते का परीक्षण

7 अगस्त को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। इस समझौते का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। एक महीने बाद, 7 सितंबर को यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ एक गंभीर आक्रमण शुरू किया, जो इस समझौते की पहली बड़ी परीक्षा बन गया।


शुरुआत में पाकिस्तान और तुर्की ने इस हमले की निंदा की, लेकिन सऊदी अरब के दबाव में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने चेतावनी दी कि अगर हमले जारी रहे, तो इस्लामाबाद को सैन्य हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। तुर्की ने अभी तक किसी सैन्य कार्रवाई की योजना नहीं बनाई है। मक्का रक्षा समझौता अपने पहले ही परीक्षण में उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, जिन पर इसे स्थापित किया गया था।


सऊदी अरब और हूती के बीच चल रहे घटनाक्रम ने उन देशों को फिर से सोचने पर मजबूर किया है, जिन्होंने हाल ही में मक्का समझौते में शामिल होने की इच्छा जताई थी।


पाकिस्तान और तुर्की की प्रतिक्रिया

जब सऊदी अरब ने यह समझौता किया, तो उसे उम्मीद थी कि पाकिस्तान उसके समर्थन में आएगा। हालाँकि, पाकिस्तान ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि वह हूती विद्रोहियों के खिलाफ हवाई हमलों में शामिल नहीं होगा। तुर्की ने केवल युद्ध समाप्त करने की अपील की है।


क्या अमेरिका की भूमिका अब खत्म हो गई?

जब यह समझौता हुआ, तो विश्लेषकों का मानना था कि खाड़ी देशों का अमेरिका पर भरोसा कम हो गया है। यही कारण है कि पाकिस्तान के साथ मिलकर एक नया गठबंधन बनाया जा रहा है, ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम की जा सके। लेकिन हाल ही में मोहम्मद बिन सलमान का डोनाल्ड ट्रंप से दो बार फोन करना यह दर्शाता है कि अमेरिका की प्रासंगिकता अभी भी बनी हुई है।


सऊदी अरब का बदलता रुख

जुलाई में अमेरिका ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को सैन्य सहायता की पेशकश की थी, जिसे सऊदी अरब ने ठुकरा दिया था। रियाद ने कहा था कि वह खुद ही हूती विद्रोहियों से निपटने में सक्षम है। सऊदी अरब को डर था कि अगर उसने अमेरिका की मदद ली, तो ईरान उस पर हमला कर सकता है। इस डर के चलते उसने तुर्की और पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता किया।


जब मक्का समझौते के तहत अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, तो मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप को फोन किया, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। जुलाई में सऊदी अरब ने 14 देशों के साथ एक नौसैनिक गठबंधन भी बनाया था, जो हूती विद्रोहियों के खिलाफ प्रभावी नहीं रहा।


विशेषज्ञों की राय

रक्षा विशेषज्ञ जॉन स्पेंसर ने मक्का समझौते को एक राजनीतिक दिखावा बताया, जबकि रिसर्चर हुसैन अब्दुल हुसैन ने कहा कि पाकिस्तान ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के सऊदी अनुरोध को ठुकरा दिया है।


हुसैन ने यह भी कहा कि सऊदी अरब तुर्की से मदद नहीं मांगेगा, क्योंकि वह नहीं चाहता कि तुर्की बाब अल-मंदेब पर नियंत्रण स्थापित करे।