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सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का नया रक्षा समझौता: क्या है इसका असली मकसद?

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने हाल ही में एक नया रक्षा समझौता किया है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने का प्रयास है। तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है। समझौते में सहयोग की उम्मीदें और औपचारिक अनुरोध की आवश्यकता पर चर्चा की गई है। क्या यह समझौता अन्य देशों को भी आकर्षित करेगा? जानें इस महत्वपूर्ण समझौते के पीछे की रणनीति और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

नई रक्षा साझेदारी का आगाज़


नई दिल्ली: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में एक नया रक्षा समझौता हुआ है, जिसने तीनों देशों के बीच सहयोग को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ गठित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि इस समझौते का उद्देश्य किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना है। उनके बयान से यह भी स्पष्ट हुआ कि समझौते का मतलब यह नहीं है कि यदि एक सदस्य पर हमला होता है, तो बाकी दोनों देश तुरंत युद्ध में शामिल हो जाएंगे।


मक्का में समझौते पर हस्ताक्षर

शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में तीनों देशों के बीच आपसी रक्षा सहयोग को बढ़ाने की बात की गई है। यह डील ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ईरान ने कई बार सऊदी अरब की ओर मिसाइलें दागी थीं, जिसे ईरान ने केवल खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर किया गया बताया है।


क्या एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा?

इस समझौते के तहत सबसे अधिक चर्चा उस प्रावधान की है, जिसके अनुसार किसी सदस्य पर हमले की स्थिति में अन्य देशों से सहयोग की अपेक्षा की गई है। इसे 'इस्लामिक NATO' भी कहा जा रहा है। हालांकि, हाकान फिदान ने कहा कि तीनों देशों ने किसी साझा दुश्मन का नाम तय नहीं किया है।


फिदान के अनुसार, कोई भी देश तब तक दुश्मन नहीं माना जाएगा जब तक वह इन तीनों में से किसी के खिलाफ हमला या शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं करता। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते में ऐसा कुछ नहीं है जो किसी विशेष देश को साझा खतरे के रूप में घोषित करता हो।


मदद के लिए औपचारिक अनुरोध आवश्यक

फिदान ने इस रक्षा व्यवस्था की तुलना NATO के अनुच्छेद 5 से की, लेकिन बताया कि किसी सदस्य को सहायता के लिए औपचारिक अनुरोध करना होगा। इसके बाद मदद का स्तर परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाएगा। सहायता में खुफिया जानकारी साझा करने, लॉजिस्टिक्स सहयोग देने से लेकर जरूरत पड़ने पर सैन्य बल भेजने तक के विकल्प शामिल हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि हर स्थिति में सैन्य कार्रवाई आवश्यक नहीं होगी।


अन्य देशों की भागीदारी की संभावना

फिदान ने बताया कि कुछ अन्य देशों ने भी इस समझौते में शामिल होने की इच्छा जताई है, हालांकि उन्होंने किसी विशेष देश का नाम नहीं लिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि मिस्र अगले चरण में इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है। समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री सैन्य प्रमुखों के साथ नियमित बैठकें करेंगे। इसके अलावा, सऊदी अरब में एक साझा सचिवालय भी स्थापित किया जाएगा, जो इस रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने का कार्य करेगा।


सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की की सैन्य ताकत को देखते हुए इस समझौते को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है, जबकि तुर्की NATO का सदस्य है और उसके पास गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। तुर्की का ड्रोन और रक्षा उद्योग भी तेजी से विकसित हो रहा है।