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हरीश साल्वे ने चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष के विरोध प्रदर्शन की आलोचना की

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष के विरोध प्रदर्शन की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को संवैधानिक संस्थाओं को निशाना नहीं बनाना चाहिए और इस तरह के विरोध प्रदर्शन से देश की राजनीति को नुकसान पहुंचता है। साल्वे ने राहुल गांधी को सलाह दी कि यदि वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो उन्हें सब कुछ बर्बाद नहीं करना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग के निर्णयों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए और कहा कि विवादों का समाधान न्यायिक तरीके से किया जाना चाहिए।
 

विपक्ष के विरोध प्रदर्शन पर हरीश साल्वे की प्रतिक्रिया

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने बुधवार को चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन की निंदा की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को संवैधानिक संस्थाओं को निशाना नहीं बनाना चाहिए। साल्वे का मानना है कि देश की राजनीति अपनी उचित सीमाओं से परे जा रही है। उन्होंने राहुल गांधी को सलाह दी कि यदि वह कभी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो उन्हें सब कुछ बर्बाद नहीं करना चाहिए। अगर सब कुछ नष्ट कर देंगे, तो शासन करने के लिए कुछ नहीं बचेगा।


 


मंगलवार को चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर एक मीडिया चैनल से बातचीत में, साल्वे ने कहा, 'राजनीति अपनी वैध सीमाओं से आगे बढ़ रही है। मैं राजनीतिक दलों और उनके विरोधियों की आलोचना को समझता हूं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर राजनीतिक हमले नहीं होने चाहिए। यही आज हो रहा है।'


 


साल्वे ने चुनाव आयोग पर एक अंग्रेजी समाचार पत्र की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, 'एक मीडिया संस्थान ने बिना किसी सबूत के एक ऐसा आरोप लगाया जो स्पष्ट नहीं था। उन्होंने कहा कि कुछ आपत्तियां थीं। क्या यह आपसी सहमति से तय किया गया या मुख्य चुनाव आयुक्त अपने सहयोगियों के खिलाफ थे?'


 



 


'दो चुनाव आयुक्तों पर उठाए सवाल'


साल्वे ने आगे कहा, 'खबर में कहा गया कि आपत्ति जताई गई, लेकिन इसे चुनाव आयोग के निर्णय के रूप में घोषित किया गया। असल में, आप बाकी दो चुनाव आयुक्तों पर आरोप लगा रहे हैं। यदि किसी पैनल में तीन लोग हैं और मैं असहमति जताता हूं, तो मैं कहूंगा कि यह गलत है। कोई निर्णय नहीं हुआ है।' 


 


उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने पूरे मामले में एक प्रेस नोट जारी किया और स्पष्ट किया कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। इसके बाद इस मामले को समाप्त हो जाना चाहिए था।


सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अंतिम होता है: साल्वे


उन्होंने कहा, 'हमारे संविधान की संरचना में समान स्तर की संस्थाएं हैं। हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चुनाव आयोग है। लेकिन एक अंतर है। जब दूसरी संस्थाएं संविधान या कानून की सीमाओं का उल्लंघन करती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अंतिम होता है। यदि सुप्रीम कोर्ट को कुछ गलत लगता है, तो वह आदेश को रद्द कर सकता है।'


 


साल्वे ने कहा, 'मुख्य न्यायाधीश ने भी यही कहा था जब उनसे पूछा गया कि, 'आप रोक क्यों नहीं लगाते?' उन्होंने कहा, 'कोई रोक की आवश्यकता नहीं है। क्या होगा?' उन्होंने कहा, 'कुछ नहीं होगा।' यदि हमें कुछ गलत लगता है, तो हम इसे सुधार सकते हैं।'


 


साल्वे ने विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को एक संवैधानिक संस्था को विवादों में घसीटने जैसा बताया और कहा कि चुनाव आयोग का राजनीतिकरण समाप्त होना चाहिए। विवादों का समाधान न्यायिक और संवैधानिक तरीके से किया जाना चाहिए।