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बुद्ध पूर्णिमा: महत्व और पूजा विधि

बुद्ध पूर्णिमा, जो 1 मई को मनाई जाएगी, हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म और ज्ञान प्राप्ति का दिन माना जाता है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, इस दिन विशेष पूजा और उपवास का महत्व है। जानें इस पर्व की पूजा विधि, चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा और वैशाख पूर्णिमा के अन्य धार्मिक महत्व के बारे में।
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बुद्ध पूर्णिमा: महत्व और पूजा विधि

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को अत्यधिक पुण्यदायी माना जाता है। वैशाख महीने की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा और बुद्ध जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष, यह पर्व 1 मई को मनाया जाएगा। यह पर्व हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों के अनुयायियों द्वारा मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा को बुद्ध का जन्म और ज्ञान प्राप्ति का दिन माना जाता है, और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था। हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस दिन अपने 9वें अवतार के रूप में बुद्ध को लिया था।


वैशाख पूर्णिमा का महत्व

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, वैशाख पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह पर्व 1 मई 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन लोग सत्यनारायण कथा सुनते हैं, चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन उपवास रखने से दिव्य शक्तियां प्राप्त होती हैं और घर में माता लक्ष्मी का वास होता है।


भगवान के तीन अवतार

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि ग्रंथों के अनुसार, वैशाख के अंतिम दिनों में भगवान विष्णु के तीन अवतार प्रकट हुए हैं। त्रयोदशी को नृसिंह जयंती, चतुर्दशी को कूर्म जयंती और पूर्णिमा को बुद्ध जयंती मनाई जाती है। इन तिथियों पर स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व है।


चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा

बुद्ध पूर्णिमा के दिन, बोधगया में बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधि वृक्ष की पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं। वैशाख पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान के बाद, घर में भगवान सत्यनारायण की पूजा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक शांति और सुख-समृद्धि का वास होता है।


वैशाख पूर्णिमा पूजा अनुष्ठान

इस दिन, भक्त सुबह जल्दी उठकर गंगा नदी में स्नान करते हैं। जो लोग गंगा नहीं जा सकते, वे घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करते हैं। इस दिन भगवान चंद्र को अर्घ्य देने के साथ-साथ दान-पुण्य का भी महत्व है। ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्रों का दान करना चाहिए।