महर्षि भरद्वाज और मनु की कथा: श्रीराम की दिव्य लीलाएँ
महर्षि भरद्वाज का आनंददायक श्रवण
याज्ञवल्क्यजी ने मधुर और भावपूर्ण स्वर में श्रीराम की कथा का वर्णन करते हुए महर्षि भरद्वाज को आनंदित किया। भरद्वाज मुनि ध्यानपूर्वक प्रभु के विभिन्न अवतारों की दिव्य लीलाओं को सुन रहे थे। नारद प्रसंग के बाद, याज्ञवल्क्यजी मनु और शतरूपा के महान तप और उनके द्वारा प्राप्त दिव्य वरदान की कथा सुनाते हैं।
मनु और शतरूपा का तप
मनु, जिन्हें मानव जाति का आदिपुरुष माना जाता है, एक पराक्रमी, तपस्वी और धर्मनिष्ठ राजा थे। उनकी पत्नी शतरूपा सदाचार और पतिव्रता धर्म की प्रतीक थीं। उनके पवित्र आचरण का गुणगान आज भी वेदों में किया जाता है। उनके पुत्र उत्तानपाद के यहाँ महान भक्त ध्रुव का जन्म हुआ, जिनकी भक्ति अमर मानी जाती है। देवहूति, जो कर्दम मुनि की पत्नी थीं, के गर्भ से महान मुनि कपिल प्रकट हुए, जिनकी महिमा समस्त संसार में गाई जाती है।
मनु का वनगमन
मनु ने धर्मपूर्वक राज्य का संचालन किया और सामान्य मनुष्यों की तरह जीवन के सुख-दुख का अनुभव करते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हुए। अंततः उनके मन में वैराग्य जाग्रत हुआ। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर पत्नी सहित वन जाने का निर्णय लिया।
तपस्या की कठोरता
नैमिषारण्य और गोमती के पावन तटों से होते हुए, वे अनेक संत-महात्माओं के आश्रमों में पहुँचे। निरंतर कठोर तप और वन के कष्ट भी उनके संकल्प को विचलित नहीं कर सके। उनके हृदय में एक ही व्याकुलता थी—कहीं यह नश्वर जीवन प्रभु के दर्शन के बिना व्यर्थ न बीत जाए।
प्रभु का दर्शन
धीरे-धीरे उनकी तपस्या और भी कठोर होती गई। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल जल का सेवन किया, फिर वायु पर जीवन यापन किया, और अंततः वायु का भी त्याग कर एक पैर पर खड़े रहकर कठोर तप में लीन हो गए। उनकी इस अद्वितीय तपस्या को देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अनेक बार उनके समीप आए और विभिन्न प्रकार से उनकी परीक्षा ली, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए।
मनु की प्रार्थना
उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर अंततः आकाशवाणी हुई—“वर मांगो।” प्रभु की वाणी सुनते ही उनका क्षीण शरीर पुनः तेजस्वी और पुष्ट हो उठा। अत्यंत भावविभोर होकर मनु ने विनम्रता से कहा—“हे प्रभु! हम आपके दिव्य रूप का साक्षात् दर्शन करना चाहते हैं। कृपा कर हमारे इस दुःख का निवारण कीजिए।”
प्रभु का वरदान
भगवान ने अपना मनोहर स्वरूप प्रकट किया। उनका श्यामवर्ण शरीर नीलकमल, नीलमणि और मेघ के समान सौम्य था। प्रभु ने कहा—“हे मनु! मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। जो भी इच्छा हो, निःसंकोच वर मांगो।” मनु ने विनम्रता से उत्तर दिया—“प्रभु! आपके दर्शन से अब कोई इच्छा शेष नहीं रही। तथापि एक अभिलाषा है—मुझे आपके समान एक पुत्र प्राप्त हो।”
मनु और शतरूपा का पुनर्जन्म
भगवान मुस्कराए और बोले—“हे मनु! मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ पुत्र रूप में अवतार ग्रहण करूँगा।” यह सुनकर मनु और शतरूपा अत्यंत प्रसन्न हुए। कुछ समय पश्चात, उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया और अगले जन्म में त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के रूप में अवतरित हुए, जहाँ स्वयं प्रभु श्रीराम ने उनके पुत्र रूप में प्रकट होकर अपनी दिव्य नरलीला की।
श्रीराम की महिमा
।।श्रीराम।।
