रमजान में जुम्मे की विशेषताएँ और नमाज की तैयारी
जुम्मा का महत्व
नई दिल्ली: रमजान का महीना मुसलमानों के लिए इबादत, धैर्य और कृपा का समय होता है। हर रोजा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जुम्मा का दिन विशेष आनंद लाता है। इस वर्ष रमजान 19 फरवरी से प्रारंभ हुआ, पहला जुम्मा 20 फरवरी को था, और आज 27 फरवरी को दूसरा जुम्मा है। रोजेदार सुबह से रोजा रखकर शाम तक इबादत में व्यस्त रहते हैं। जुमे की नमाज मस्जिद में एकत्र होकर अदा करना सुन्नत है। यह दिन बरकतों और माफी का अवसर प्रदान करता है, इसलिए समय का ध्यान रखना आवश्यक है।
जुमे की नमाज का समय और खुतबा
जुमे की नमाज आमतौर पर दोपहर के समय मस्जिदों में अदा की जाती है। खुतबा सामान्यतः 12:15 से 12:45 बजे के बीच आरंभ होता है। इमाम अल्लाह की प्रशंसा, रसूल पर दुरूद और भलाई की सलाह देते हैं। इसके बाद नमाज 12:45 से 1:30 बजे के बीच पढ़ी जाती है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में यह समय लगभग समान रहता है, लेकिन स्थानीय मस्जिद या इमाम से समय की पुष्टि कर लेना उचित है, क्योंकि मौसम और स्थान के अनुसार थोड़ा बदलाव हो सकता है।
रमजान में जुम्मे की विशेष फजीलत
जुम्मा का दिन हजरत मुहम्मद ने सभी दिनों का सरदार बताया है और इसे ईद के समान दर्जा दिया गया है। जब यह रमजान में आता है, तो इसकी फजीलत और भी बढ़ जाती है। रोजेदारों के लिए यह बरकत और माफी का बड़ा अवसर होता है। जुमे के दिन की दुआएं अधिकतर कबूल होती हैं। अल्लाह अपने बंदों के गुनाह माफ करते हैं और भलाई का सिला देते हैं। इसलिए मस्जिद जाकर इबादत करना महत्वपूर्ण है।
जुमे की नमाज कैसे अदा करें
रोजेदार सुबह से इफ्तार तक रोजा रखते हुए जुमे की तैयारी करें। गुस्ल करके साफ-सुथरे कपड़े पहनें। मस्जिद में जाकर खुतबा सुनें और चुप रहें। खुतबे के दौरान बातचीत करना मना है। नमाज दो रकअत फर्ज होती है, जो सामूहिक रूप से अदा की जाती है। इसे घर पर नहीं पढ़ा जा सकता। जुमे के बाद दुआ मांगें, कुरान पढ़ें और सदका दें। परिवार के साथ मिलकर इस दिन को यादगार बनाएं।
जुमे का संदेश और तैयारी
जुम्मा केवल नमाज का दिन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता और भलाई का अवसर भी है। रमजान में यह और भी पवित्र हो जाता है। आज के जुमे में अल्लाह से माफी, स्वास्थ्य और खुशहाली की प्रार्थना करें। मस्जिद जाने से पहले समय की जांच कर लें। स्थानीय ऐप या मस्जिद के नोटिस को देखें। रमजान की बरकतें प्राप्त करने के लिए हर जुम्मा को विशेष इबादत का दिन बनाएं। अल्लाह सभी की दुआएं कबूल करें।
