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वट सावित्री व्रत: परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम

वट सावित्री व्रत का उत्सव हर साल ज्येष्ठ महीने में मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। इस अवसर पर पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। पूजा की प्रक्रिया में 'नहाय-खाय' की रस्म से लेकर विशेष पंखों का उपयोग और दूल्हा-दुल्हन की आकृतियों का निर्माण शामिल है। जानें इस त्योहार की अनोखी परंपराएं और रस्में।
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वट सावित्री व्रत: परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम

वट सावित्री व्रत का उत्सव


नई दिल्ली: वट सावित्री व्रत के अवसर पर शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक एक अद्भुत उत्साह देखने को मिल रहा है। सुबह से ही पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा की तैयारियों में जुटी हुई हैं। उनके माथे पर सिंदूर की लंबी लकीर, हाथों में पूजा की सामग्री से भरी टोकरियां और रंग-बिरंगे हाथ से बने पंखे इस त्योहार की पहचान बन चुके हैं।


यह व्रत पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए मनाया जाता है। ज्येष्ठ महीने की गर्मी में आयोजित इस अनुष्ठान में महिलाएं बांस या तार से बने पंखों से अपने पतियों को हवा देने की परंपरा निभाती हैं, जिन्हें स्थानीय बोली में 'बयान' कहा जाता है।


पूजा की प्रक्रिया

पूजा की शुरुआत कैसे होती है?


पूजा का अनुष्ठान एक दिन पहले 'नहाय-खाय' की रस्म से शुरू होता है। घरों में सात्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें अरवा चावल, मूंग दाल, आलू और परवल की सब्जी, खीर, ठेकुआ, गुलगुला और अन्य पारंपरिक मिठाइयां शामिल होती हैं। व्रत के दौरान महिलाएं मुख्य रूप से मीठे व्यंजन ही ग्रहण करती हैं।


मिथिला क्षेत्र में विशेष परंपराएं उन महिलाओं के लिए होती हैं, जो पहली बार यह व्रत रख रही हैं। कई महिलाएं इसे अपने मायके में रहकर करना पसंद करती हैं, जबकि ससुराल से साड़ी, सुहाग की निशानियां, फल और नाग-नागिन की मिट्टी की मूर्तियां उपहार के रूप में भेजी जाती हैं।


विशेष महत्व और रस्में

किन चीजों का विशेष महत्व है?


महिलाएं शुभ गीत गाते हुए अपने घरों से पूजा स्थल की ओर जाती हैं और बरगद के पेड़ को अपनी पूजा सामग्री अर्पित करती हैं। सात अलग-अलग रंगों में बुनी हुई टोकरियां और विशेष पंखे इन अनुष्ठानों के दौरान महत्वपूर्ण माने जाते हैं।


इस व्रत से जुड़ी एक अनोखी रस्म है, कपड़े और रुई से दूल्हा-दुल्हन की आकृतियां बनाना। महिलाएं सावित्री और सत्यवान के प्रतीक के रूप में इन आकृतियों को बनाती हैं और उनके लिए एक प्रतीकात्मक विवाह समारोह आयोजित करती हैं।


मैनापट पौधे की परंपरा

'मैनापट' पौधे से जुड़ी परंपरा क्या है?


एक और विशिष्ट परंपरा 'मैनापट' पौधे के इर्द-गिर्द घूमती है। नाग-नागिन की मिट्टी की आकृतियों को इसके पत्तों पर रखा जाता है और उन्हें दूध चढ़ाया जाता है। यह प्रथा प्रकृति की पूजा में गहराई से निहित है और सावित्री तथा सत्यवान की कथा से जुड़ी हुई है।


महिलाएं बरगद के पत्तों का उपयोग करके मुकुट और सजावटी वस्तुएं भी बनाती हैं। पूजा के बाद, महिलाएं अपने पतियों को तिलक लगाती हैं, उन्हें पंखा झलती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। यह त्योहार परंपरा, आस्था और पारिवारिक बंधनों का एक अनूठा संगम माना जाता है।