नई तकनीक से Wi-Fi के जरिए ट्रैकिंग का खतरा बढ़ा
डिजिटल प्राइवेसी पर नई बहस
नई दिल्ली - हाल ही में डिजिटल प्राइवेसी और निगरानी के मुद्दे पर एक नई बहस शुरू हुई है। जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा दावा किया है जो इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के लिए चिंता का विषय बन गया है। उनके शोध के अनुसार, साधारण Wi-Fi राउटर अब बिना किसी कैमरे या स्मार्ट डिवाइस के लोगों की गतिविधियों को ट्रैक कर सकते हैं।
Wi-Fi सिग्नल से निगरानी की नई तकनीक
Wi-Fi सिग्नल से इंसानों की निगरानी!
जर्मनी के कार्लसरुहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (KIT) के शोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक विकसित की है, जिसे “BFId” नाम दिया गया है। यह तकनीक Wi-Fi नेटवर्क में उपयोग होने वाले “Beamforming Feedback Information (BFFI)” फीचर का उपयोग करती है।
Wi-Fi 5 और उससे आगे की तकनीक में यह फीचर इंटरनेट सिग्नल को बेहतर बनाने के लिए जोड़ा गया था। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि अब इस सिग्नल का उपयोग लोगों की मूवमेंट और बॉडी पैटर्न को पहचानने में किया जा सकता है।
रेडियो इमेजिंग तकनीक
बिना कैमरे के बन रही ‘रेडियो इमेज’
शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग और AI मॉडल्स का उपयोग करके इंसानी शरीर की “रेडियो इमेज” बनाने की विधि विकसित की है। यह तकनीक रोशनी की जगह रेडियो तरंगों का उपयोग करती है।
जब कोई व्यक्ति कमरे में चलता है, तो उसके शरीर से Wi-Fi तरंगें प्रभावित होती हैं। सिस्टम इन परिवर्तनों को रिकॉर्ड करता है और AI उस व्यक्ति की चाल, शरीर की बनावट और मूवमेंट पैटर्न के आधार पर उसकी पहचान कर लेता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 197 लोगों पर किए गए परीक्षण में इस तकनीक ने लगभग 99.5 प्रतिशत सटीकता से पहचान करने का दावा किया है।
स्मार्टफोन की आवश्यकता नहीं
अब स्मार्टफोन भी जरूरी नहीं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि किसी व्यक्ति के पास मोबाइल, स्मार्टवॉच या कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होना भी आवश्यक नहीं है। केवल शरीर की हलचल से उत्पन्न रेडियो बदलावों के आधार पर उसकी मौजूदगी और गतिविधि को ट्रैक किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में सुरक्षा, निगरानी और डेटा प्राइवेसी के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है।
प्राइवेसी का खतरा
प्राइवेसी को क्यों माना जा रहा खतरा?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही Wi-Fi सिग्नल सीधे किसी का नाम या पहचान न बताते हों, लेकिन यदि इन्हें लोकेशन हिस्ट्री, मोबाइल डेटा या अन्य डिजिटल रिकॉर्ड्स से जोड़ा जाए तो किसी भी व्यक्ति की पहचान आसानी से उजागर की जा सकती है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सार्वजनिक स्थानों, ऑफिस, मॉल और भीड़भाड़ वाले इलाकों में इस तरह की निगरानी का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। खासकर पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों के लिए यह तकनीक गंभीर चिंता का विषय बन सकती है।
बचाव के उपाय
बचाव के लिए क्या करें?
शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय टेक कंपनियों और रेगुलेटरी संस्थाओं से Wi-Fi स्टैंडर्ड्स में मजबूत एन्क्रिप्शन और प्राइवेसी सुरक्षा जोड़ने की मांग की है।
जब तक नई सुरक्षा व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक विशेषज्ञों ने लोगों को सार्वजनिक Wi-Fi नेटवर्क का उपयोग करते समय सतर्क रहने, राउटर के फर्मवेयर को अपडेट रखने और सुरक्षित नेटवर्क का उपयोग करने की सलाह दी है।
