हरियाणा के किसानों की चिंता: पेंशन और फसल की कीमत का संकट
किसानों में बढ़ती बेचैनी
चंडीगढ़ . हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय एक अजीब सी बेचैनी का माहौल है। खेतों में मेहनत करके फसल उगाने वाले किसान अब अपनी मेहनत की उचित कीमत मांगने में हिचकिचा रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा बुजुर्ग किसानों के लिए 3 लाख रुपये की अधिकतम सालाना आय सीमा निर्धारित करने से उन्हें एक गंभीर दुविधा का सामना करना पड़ रहा है। दशकों से सरकारी मंडियों में अपनी फसल बेचने वाले किसान अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ उठाने से डर रहे हैं।
क्यों 'मेरी फसल-मेरा ब्योरा' पोर्टल से दूरी बना रहे हैं किसान?
गेहूं और सरसों की अच्छी पैदावार के बावजूद किसानों का यह डर बेबुनियाद नहीं है। सरकारी नियमों के अनुसार, यदि कोई बुजुर्ग किसान अपनी फसल MSP पर 3 लाख रुपये से अधिक में बेचता है, तो उसकी वार्षिक आय सीमा पार हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि समाज कल्याण विभाग उसकी बुढ़ापा पेंशन रोक देता है। इसके साथ ही, उनकी बीपीएल (BPL) सूची से भी कटौती हो जाती है, जिससे उन्हें मिलने वाले मुफ्त राशन और अन्य सरकारी सुविधाएं भी समाप्त हो जाती हैं। इस डर के कारण किसान अब 'मेरी फसल-मेरा ब्योरा' पोर्टल पर अपनी फसल का पंजीकरण कराने से बच रहे हैं।
जे-फॉर्म बनते ही आमदनी सरकारी रडार पर
किसानों की इस स्थिति को समझने के लिए मंडी के सिस्टम को जानना आवश्यक है। जब किसान 'मेरी फसल-मेरा ब्योरा' पोर्टल पर पंजीकरण कराकर मंडी पहुंचते हैं, तो मार्केट कमेटी बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के बाद टोकन जारी करती है। आढ़ती के माध्यम से खरीद एजेंसी को फसल बेचने पर तुरंत एक ऑनलाइन 'जे-फॉर्म' (J-Form) जनरेट होता है। जे-फॉर्म के बनने के साथ ही फसल की पूरी राशि सीधे किसान के बैंक खाते में ट्रांसफर हो जाती है। यह डिजिटल एंट्री सीधे सरकार के डेटाबेस में जुड़ जाती है और किसान की आमदनी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती है।
निजी व्यापारियों को हो रहा लाभ
हाल के महीनों में कई बुजुर्ग किसानों की पेंशन अचानक बंद हो गई है। जब इन किसानों ने समाज कल्याण विभाग के दफ्तरों में जाकर जानकारी ली, तो उन्हें बताया गया कि 'आपने अधिक कीमत की फसल बेची है, इसलिए आपकी आय 3 लाख की सीमा पार कर गई है।'
किसानों की यह दुविधा अब निजी व्यापारियों और जमाखोरों के लिए लाभ का बड़ा साधन बन गई है। बीपीएल कार्ड और बुढ़ापा पेंशन बचाने की कोशिश में बुजुर्ग किसान अब मंडी जाने के बजाय अपनी फसल को गांव के प्राइवेट व्यापारियों को औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हैं। एक ओर फसल का उचित मूल्य है और दूसरी ओर बुढ़ापे की पेंशन, किसान यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें क्या चुनना चाहिए।
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