LPG संकट: पश्चिम एशिया में युद्ध का असर भारतीय रसोई पर
LPG संकट का प्रभाव
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का प्रभाव अब आम लोगों की रसोई और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच की सैन्य गतिविधियों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी ने वैश्विक LPG आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, इस आपूर्ति श्रृंखला को सामान्य स्थिति में लौटने में 3 से 4 साल लग सकते हैं।
संकट की जड़ें
भारत अपनी कुल LPG खपत का लगभग 60% आयात करता है। युद्ध शुरू होने से पहले, इस आयात का लगभग 90% हिस्सा खाड़ी देशों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से आता था। हाल ही में ईरान द्वारा ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमलों के कारण यह आपूर्ति घटकर 55% रह गई है।
महत्वपूर्ण स्रोतों का बंद होना
एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "कई महत्वपूर्ण आपूर्ति स्रोत बंद हो गए हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि तेल के कुएं पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं या उत्पादन रोक दिया गया है। लेकिन सप्लायर्स ने कहा है कि इस नुकसान की भरपाई में कम से कम 3 साल का समय लगेगा।"
कीमतों में वृद्धि और स्टोरेज की समस्या
रुबिक्स डेटा साइंसेज और वायना ट्रेडएक्सचेंज की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वैकल्पिक रास्ते खोजने के बावजूद 40-50 प्रतिशत आपूर्ति प्रभावित रह सकती है। भारत में सालाना 33 मिलियन टन LPG की मांग है, जबकि हमारी स्टोरेज क्षमता केवल 15 दिनों की खपत के बराबर है। आपूर्ति में कमी, बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत में वृद्धि के कारण कीमतों में तेजी आई है। हाल ही में घरेलू सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमत में 60 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर में 115 रुपये की वृद्धि हुई है।
अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत अपनी LPG आवश्यकताओं (लगभग 92%) के लिए UAE (41%), कतर (22%) और सऊदी अरब जैसे देशों पर निर्भर है। महंगी गैस का प्रभाव सीधे तौर पर होटलों, रेस्टोरेंट्स और MSME क्षेत्र के व्यवसायों पर पड़ रहा है। इसके अलावा, तेल विपणन कंपनियों पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता जा रहा है।
सरकार की तैयारी
सुखद बात यह है कि सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। कोविड-19 के दौरान अपनाए गए आपातकालीन योजना को फिर से लागू किया जा रहा है। सरकार का ध्यान इस बात पर है कि घरों में गैस की कमी न हो। इसके लिए नए आयात स्रोतों की खोज, जहाजों के रूट में बदलाव और देश की रिफाइनरियों में स्थानीय उत्पादन को अधिकतम करने पर जोर दिया जा रहा है।
