ईरान युद्ध का भारत पर महंगाई का प्रभाव: ईंधन और खाद्य कीमतों में वृद्धि
महंगाई की आग का असर
ईरान में चल रहे युद्ध का प्रभाव अब भारत में भी महसूस किया जा रहा है, जिससे महंगाई की समस्या तेजी से बढ़ने की संभावना है। तेल, खाद्य पदार्थ और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो रही है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि आम आदमी की जेब पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। सबसे बड़ा झटका ईंधन की कीमतों में आया है, जहां सरकारी तेल कंपनियों ने प्रीमियम श्रेणी के पेट्रोल की कीमतों में दो रुपये से अधिक की वृद्धि की है। विभिन्न कंपनियों के उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल में यह वृद्धि 2.09 से 2.35 रुपये प्रति लीटर तक हुई है। हालांकि, सामान्य पेट्रोल और डीजल की कीमतें अभी स्थिर रखी गई हैं ताकि जनता को तुरंत झटका न लगे, लेकिन यह राहत अस्थायी है।
डीजल की कीमतों में उछाल
हालांकि, असली खतरा यहीं खत्म नहीं होता। औद्योगिक डीजल की कीमतों में भी भारी वृद्धि हुई है। पहले जो डीजल लगभग 87 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था, वह अब 109 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया है। यह डीजल आम जनता के लिए नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों, खनन कंपनियों, निर्माण कार्यों और बड़े बिजली संयंत्रों में उपयोग होता है। इसका सीधा मतलब है कि उत्पादन लागत बढ़ेगी, माल ढुलाई महंगी होगी, और अंततः हर चीज की कीमत आम आदमी से वसूली जाएगी। हाल ही में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी 60 रुपये की वृद्धि की गई थी।
पश्चिम एशिया में संघर्ष का प्रभाव
इस पूरी स्थिति की जड़ पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष है। ईरान और उसके विरोधियों के बीच बढ़ते टकराव ने कच्चे तेल की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है। कई बार यह 120 डॉलर तक भी उछल चुका है। सबसे बड़ी चिंता उस समुद्री मार्ग को लेकर है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
भारत की स्थिति
भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि देश अपनी आवश्यकताओं का 85 से 90 प्रतिशत तेल विदेशों से आयात करता है। इनमें से लगभग आधा तेल उसी संवेदनशील समुद्री मार्ग से आता है। जैसे ही वहां खतरा बढ़ता है, जहाजों का खर्च बढ़ता है, बीमा महंगा होता है, और कुल मिलाकर भारत का आयात बिल आसमान छूने लगता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालती है और महंगाई को बढ़ाती है।
आर्थिक आकलन
सरकारी आकलन और भी चिंताजनक हैं। यदि यह संकट कुछ महीनों तक जारी रहा, तो भारत को हर साल 30,000 से 50,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। व्यापार घाटा हर तिमाही में 5 से 10 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। थोक महंगाई दर में भी 0.3 से 0.7 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है। निर्यात पर भी 2 से 4 प्रतिशत तक असर पड़ने की आशंका है, क्योंकि वैश्विक मांग कमजोर हो रही है और परिवहन लागत बढ़ रही है।
महंगाई का असर
महंगाई का असर अब शहरों में भी स्पष्ट हो रहा है। खाद्य डिलीवरी कंपनियों ने भी अपने शुल्क बढ़ा दिए हैं। जोमैटो पर अब हर ऑर्डर पर पहले से अधिक पैसे चुकाने होंगे। यानी घर पर खाना मंगाना भी अब सस्ता नहीं रहेगा। दूसरी ओर, सोने और चांदी जैसे कीमती धातुओं के बाजार में भारी गिरावट आई है। तेल की कीमतों में वृद्धि और वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशकों का रुख बदल गया है। सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 6 प्रतिशत तक गिर गया है, जबकि चांदी में 10 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है।
आर्थिक दबाव का संकेत
यह पूरा घटनाक्रम स्पष्ट संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में आर्थिक दबाव और बढ़ेगा। रुपया कमजोर हो रहा है, विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं, और ईंधन के साथ-साथ रसोई गैस की कीमतें भी बढ़ गई हैं। अब सवाल यह नहीं है कि महंगाई कितनी बढ़ेगी, बल्कि यह है कि महंगाई किस क्षेत्र को कैसे प्रभावित करेगी। यह स्पष्ट है कि ईरान युद्ध अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे भारतीय रसोई, जेब और जीवन को प्रभावित कर रहा है। आने वाले महीनों में इसका असर और भी तीव्र होने की संभावना है।
