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ईरान युद्ध के चलते तेल की कीमतों में भारी उछाल: 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची

ईरान में युद्ध के चलते तेल की कीमतें 2022 के बाद पहली बार 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इस वृद्धि का मुख्य कारण फारस की खाड़ी में जारी हिंसा है, जो वैश्विक तेल और गैस उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं, तो महंगाई में वृद्धि होगी। जानें इस संकट का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा और भविष्य में क्या संभावनाएं हैं।
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ईरान युद्ध के चलते तेल की कीमतों में भारी उछाल: 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची

तेल की कीमतों में वृद्धि का कारण

ईरान में युद्ध के बढ़ने के साथ, तेल की कीमतें 2022 के बाद पहली बार 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत में शुक्रवार की तुलना में 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जब यह 92.69 डॉलर प्रति बैरल थी। ईरान युद्ध के दूसरे सप्ताह में प्रवेश करते ही कई देशों पर इसका प्रभाव पड़ा है, जिससे तेल की कीमतों में तेजी आई है। फारस की खाड़ी में ऐसे कई देश हैं जो तेल और गैस के उत्पादन और परिवहन के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।


23% की एकमुश्त छलांग: आंकड़ों का विश्लेषण

शुक्रवार को बाजार बंद होने पर तेल की कीमत 92.69 डॉलर प्रति बैरल थी। सोमवार की सुबह बाजार खुलते ही इसमें 23% की जबरदस्त वृद्धि देखी गई। यह वृद्धि आपूर्ति में बाधा आने के डर को दर्शाती है।


शुक्रवार की कीमत: 92.69 डॉलर प्रति बैरल


सोमवार की कीमत: 114.00+ डॉलर प्रति बैरल


वृद्धि: लगभग 21 डॉलर प्रति बैरल (एक ही सत्र में)


फारस की खाड़ी: युद्ध की चपेट में 'ऑयल हब'

तेल की कीमतों में इस वृद्धि का मुख्य कारण फारस की खाड़ी में जारी हिंसा है। यह क्षेत्र वैश्विक तेल और गैस उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है।


होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया का लगभग 20% तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। युद्ध के कारण यहाँ जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। ईरान में तेल डिपो और रिफाइनरियों पर हमलों ने उत्पादन क्षमता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है। कतर, बहरीन और यूएई जैसे देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर मंडराते खतरों ने निवेशकों में घबराहट पैदा कर दी है।


अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: महंगाई का नया दौर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं, तो वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे माल ढुलाई महंगी होगी और महंगाई बेकाबू हो जाएगी। एक मार्केट एनालिस्ट ने कहा, "यह अब केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है; यह एक 'फिजिकल सप्लाई शॉक' है। 114 डॉलर का स्तर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक टैक्स की तरह काम करेगा, जिससे रिकवरी की गति धीमी हो जाएगी।"


ईरान युद्ध के चलते तेल की कीमतों में आया यह उछाल भविष्य के लिए बड़े संकट का संकेत है। जब तक फारस की खाड़ी में स्थिरता नहीं आती, ऊर्जा बाजार में यह अस्थिरता बनी रहने की संभावना है।