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कच्चे तेल की कीमतों में उछाल: चीन की चुप्पी के पीछे की वजहें

कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल ने वैश्विक बाजार में हलचल मचा दी है, लेकिन चीन की चुप्पी ने सबको चौंका दिया है। जानें कि कैसे चीन ने अपने विशाल तेल भंडार और सस्ते आयात के माध्यम से इस संकट का सामना किया है। क्या चीन की रणनीतियाँ अन्य देशों के लिए एक उदाहरण बन सकती हैं? इस लेख में हम चीन की तेल खरीद, उसके भंडार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चा करेंगे।
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कच्चे तेल की कीमतों में उछाल: चीन की चुप्पी के पीछे की वजहें

नई दिल्ली में कच्चे तेल की स्थिति


नई दिल्ली : वैश्विक स्तर पर युद्ध की स्थिति के चलते कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले सप्ताह ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की संभावना जताई गई थी, लेकिन अब यह अचानक 110 डॉलर के स्तर को छू चुकी है। यह स्थिति सभी के लिए चौंकाने वाली है। तेल आयात करने वाले देशों में चीन सबसे बड़ा है, इसके बाद भारत का स्थान है। फिर भी, चीन की ओर से कोई महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं आई है। एक महीने में 56 प्रतिशत की वृद्धि के बाद भी, कीमतें 108 डॉलर के आसपास स्थिर हैं।


चीन के पास विशाल तेल भंडार

चीन ने पिछले कुछ वर्षों में कच्चे तेल का भंडार बढ़ाया है। अनुमान है कि उसके पास लगभग 900 मिलियन बैरल का रणनीतिक भंडार है, जो उसकी 90 से 120 दिनों की आयात आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। चीन प्रतिदिन 15-16 मिलियन बैरल तेल का उपयोग करता है और खुद 4 मिलियन बैरल का उत्पादन करता है। इस प्रकार, उसके पास लगभग 4 महीने का तेल सुरक्षित है, जबकि भारत के पास केवल 45-50 दिन का भंडार है। इस स्थिति में, अचानक कीमतों में वृद्धि से चीन चिंतित नहीं होता।


रूस और ईरान से सस्ता तेल

चीन अभी भी रूस और ईरान से सस्ते दामों पर तेल खरीद रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद, यह आयात जारी है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद, चीन पर इसका प्रभाव बहुत कम है। सस्ते सौदों के कारण उसकी लागत नियंत्रित रहती है, जिससे वह बिना घबराए स्थिति का सामना कर रहा है।


मिडिल ईस्ट के साथ दीर्घकालिक समझौते

चीन ने सऊदी अरब और यूएई जैसे तेल उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालिक समझौते किए हैं, जिनमें कीमतें स्पॉट मार्केट की तुलना में कम उतार-चढ़ाव वाली हैं। यदि कीमतें बहुत अधिक बढ़ जाती हैं, तो चीन आयात कम करके अपने भंडार का उपयोग कर सकता है, जिससे बाजार में अस्थिरता नहीं फैलती और आपूर्ति सुरक्षित रहती है।


अंतरराष्ट्रीय संकटों में चुप्पी

चीन अंतरराष्ट्रीय संकटों पर सार्वजनिक बयान देने से बचता है। वह पर्दे के पीछे कूटनीतिक वार्ता और आर्थिक रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करता है। तेल पर निर्भरता कम करने के लिए, उसने कोयला, गैस, परमाणु ऊर्जा और हरित ऊर्जा में भारी निवेश किया है, जिससे तेल की महंगाई का प्रभाव उसकी अर्थव्यवस्था पर सीमित रहता है।


ट्रंप की चीन यात्रा का महत्व

अमेरिका और चीन के बीच बातचीत जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 31 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक चीन का दौरा करेंगे, जहां उनकी शी जिनपिंग से मुलाकात होगी। यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की पहली चीन यात्रा है, और इस मौके पर चीन किसी विवाद से बचना चाहता है। व्यापार तनाव, टैरिफ और तेल खरीद जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। खबर है कि चीन 500 विमान खरीदने का बड़ा सौदा भी कर सकता है।


चीन का तेल आयात

2025 में, चीन ने 557.7 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जो औसतन 11.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बराबर है। 2024 में यह आंकड़ा 11.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। हाल के महीनों में, आयात 12-13 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अकेले चीन द्वारा खरीदा जाता है, फिर भी कीमतों में वृद्धि पर वह चुप है।