बजट 2026: उद्योगों और आम जनता की उम्मीदें
सरकार का ध्यान 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'ईज ऑफ लिविंग' पर
सरकार का ध्यान 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'ईज ऑफ लिविंग' पर केंद्रित रहने की उम्मीद
देश का आम बजट पेश होने में एक महीने से भी कम समय रह गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी 2026 को बजट प्रस्तुत करेंगी। इस बार उम्मीद की जा रही है कि सरकार ऐसा बजट लाएगी जो घरेलू उद्योगों और बाजार में तरलता बनाए रखे और विकास दर को भी स्थिर रखे।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी, जिसमें प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भाग लिया। इस बैठक में वित्त मंत्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने अर्थशास्त्रियों से बजट पर सुझाव मांगे और विकसित भारत 2047 के लिए विशेष प्रयास करने की अपील की।
सरकार उठा सकती है कई बड़े कदम
आगामी केंद्रीय बजट से उद्योगों और आम जनता को काफी उम्मीदें हैं। सरकार का ध्यान मुख्य रूप से 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'ईज ऑफ लिविंग' पर केंद्रित रहने की संभावना है। जानकार मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए सरकार को पूंजीगत व्यय में वृद्धि करनी चाहिए। नई श्रम संहिताओं का पूर्ण कार्यान्वयन और जीएसटी दरों में सुधार की भी उम्मीद है।
केंद्र ने राष्ट्रीय खातों के आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करने की योजना बनाई है, जिससे जीडीपी गणना की सटीकता में सुधार होगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अहम होगा साल 2026
साल 2025 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शानदार रहा, जिसमें उसने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उल्लेखनीय विकास दर हासिल की। अब 2026 में नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। भारत ने 2025 में जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान प्राप्त किया है।
अब विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए जर्मनी को पीछे छोड़ना होगा। वर्तमान में भारत एक 'गोल्डिलॉक्स' चरण में है, जहां मजबूत वृद्धि दर और नरम महंगाई का दुर्लभ मेल देखने को मिल सकता है। हालांकि, वैश्विक व्यापार में तनाव और मुद्रा बाजार की अस्थिरता नीति निर्माताओं के लिए चुनौती बनी रहेगी।
रुपए में कमजोरी चिंता का विषय
आर्थिक मजबूती के बावजूद, भारतीय रुपया 2026 में भी दबाव में रहने के संकेत दे रहा है। वर्ष 2025 में रुपये ने डॉलर के मुकाबले 91 का ऐतिहासिक निचला स्तर देखा। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा घोषित पारस्परिक टैरिफ के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर निकासी की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा मुद्रा संकट मुख्य रूप से गिरते पूंजी प्रवाह और अस्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह के कारण है।
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