भारत की अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया के तनाव का प्रभाव
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव का असर
पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने भारत की आर्थिक स्थिति और ऊर्जा क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद, घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतें स्थिर रहने से सरकारी तेल विपणन कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि कच्चे तेल की बढ़ती लागत और पंपों पर स्थिर कीमतों के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में, पेट्रोल पर कंपनियों को ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर का घाटा हो रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों का प्रभाव
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 120-125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बनी रहती हैं, तो पेट्रोलियम कंपनियों का विपणन मार्जिन नकारात्मक बना रहेगा, जिससे उनकी लाभप्रदता प्रभावित होगी। इक्रा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने बताया कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद वाहन ईंधन की कीमतों में स्थिरता से कंपनियों की मुनाफा कमाने की क्षमता पर असर पड़ रहा है।
इसके अलावा, रसोई गैस (एलपीजी) पर भी भारी नुकसान होने की आशंका है, जो वित्त वर्ष 2026-27 में लगभग 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
उर्वरक सब्सिडी में वृद्धि
इस दौरान, उर्वरक सब्सिडी बढ़कर 2.05 लाख करोड़ से 2.25 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंचने का अनुमान है, जो बजट अनुमान से काफी अधिक है। इक्रा ने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधाओं के कारण ईंधन, उर्वरक और रसायनों की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जिससे कीमतों में वृद्धि और कंपनियों पर लागत दबाव बढ़ा है।
फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया संकट शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 70-72 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है।
लाभप्रदता पर असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा और कच्चे माल की बढ़ती लागत का असर तेल विपणन, उर्वरक, रसायन और शहरी गैस वितरण क्षेत्रों की लाभप्रदता पर पड़ेगा, क्योंकि कंपनियां लागत का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पा रही हैं।
इक्रा ने कच्चे तेल रिफाइनिंग क्षेत्र के लिए परिदृश्य को 'स्थिर' रखा है, लेकिन ईंधन खुदरा बिक्री, उर्वरक, बेसिक केमिकल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्रों के लिए 'नकारात्मक' दृष्टिकोण व्यक्त किया है।
किसानों की स्थिति
उर्वरक क्षेत्र में सल्फर और अमोनिया की कीमतों में वृद्धि तथा प्राकृतिक गैस महंगी होने से लागत में तेज इजाफा हुआ है। यूरिया पूल की कीमत अप्रैल 2026 में बढ़कर लगभग 19 डॉलर प्रति यूनिट हो गई है, जो संकट से पहले लगभग 13 डॉलर थी।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि कच्चे माल की महंगाई और सब्सिडी में पर्याप्त संशोधन न होने से फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरक कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है। मौसम संबंधी जोखिम भी किसानों की कीमत बढ़ोतरी सहने की क्षमता को सीमित कर सकते हैं।
