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भारत की आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट के संकेत, निजी उपभोग पर चिंता

भारत की आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं, खासकर निजी उपभोग की वृद्धि दर में कमी के कारण। केंद्र सरकार के नए अनुमान के अनुसार, 2025-26 में आर्थिक वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने की संभावना है। हालांकि, वास्तविक वृद्धि दर पिछले वर्ष की तुलना में अधिक दिख रही है, लेकिन नोमिनल वृद्धि दर में कमी से टैक्स संग्रह पर दबाव बढ़ेगा। जानें इस स्थिति के पीछे के कारण और इसके संभावित प्रभाव।
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भारत की आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट के संकेत, निजी उपभोग पर चिंता

आर्थिक वृद्धि की चुनौतियाँ

निजी उपभोग की वृद्धि दर में कमी एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है। आयकर छूट की सीमा 12 लाख रुपये करने, जीएसटी दरों के नए ढांचे को लागू करने और मुद्रास्फीति के कम रहने के बावजूद, निजी उपभोग में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है।


केंद्र सरकार ने अपने पहले वार्षिक अनुमान में बताया है कि 2025-26 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने की संभावना है। हालांकि, अंतिम आंकड़े मई में सामने आएंगे, लेकिन यह अनुमान महत्वपूर्ण है क्योंकि वित्त मंत्री इसी आधार पर आगामी बजट तैयार करेंगी। शीर्षक के अनुसार, इस वर्ष जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर काफी मजबूत रहने की उम्मीद है। लेकिन इसमें कई जटिलताएँ हैं।


वास्तविक वृद्धि दर पिछले वर्ष के 6.5 प्रतिशत से 0.9 प्रतिशत अधिक है, लेकिन इस वर्ष की कुल (नोमिनल) वृद्धि दर केवल 8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष से 1.8 प्रतिशत कम है। इसका मतलब है कि मुद्रास्फीति की कम दर के कारण वास्तविक वृद्धि दर अधिक दिख रही है।


नोमिनल वृद्धि दर में कमी का असर टैक्स संग्रह में कमी के रूप में सामने आएगा, जिससे राजकोष पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि, रिजर्व बैंक से मिलने वाले डिविडेंड और विनिवेश से प्राप्त राजस्व के कारण यह दबाव स्पष्ट नहीं हो सकता।


पिछले वर्ष के 7.2 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष निजी उपभोग की वृद्धि दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमजोरी को दर्शाता है।


यह स्थिति बताती है कि आमदनी और बचत की स्थिति जमीनी स्तर पर कमजोर है। कृषि क्षेत्र में वृद्धि दर में गिरावट का अनुमान है, जिसका प्रभाव ग्रामीण आय और उपभोग पर पड़ेगा। ऐसे में अगले वर्ष निजी निवेश में वृद्धि की संभावना भी कम है।


इस बीच, अमेरिकी टैरिफ और अन्य प्रतिकूल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर भी अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में वृद्धि दर 8 प्रतिशत रही, जबकि अगले छह महीनों में यह 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह बिगड़ते हालात को दर्शाता है। स्पष्ट है कि हेडलाइन से जो मजबूत अर्थव्यवस्था की छवि उभरती है, वह अंदरूनी आंकड़ों से कायम नहीं रह पाती!