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भारत की जीएसटी व्यवस्था पर विवाद: गरीबों का टैक्स बोझ

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की मुकुलिका बनर्जी ने भारत की जीएसटी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं, यह दावा करते हुए कि गरीब लोग अमीरों की तुलना में अधिक टैक्स चुकाते हैं। उनके इस बयान पर विशेषज्ञों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है, यह कहते हुए कि अधिकांश आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स नहीं है। जानें इस विवाद के पीछे की सच्चाई और सरकार द्वारा किए गए सुधारों के बारे में।
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भारत की जीएसटी व्यवस्था पर विवाद: गरीबों का टैक्स बोझ

जीएसटी पर उठे सवाल


लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की सामाजिक मानवविज्ञानी मुकुलिका बनर्जी ने भारत की जीएसटी प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि गरीब लोग अपनी आय के अनुपात में अमीरों की तुलना में अधिक टैक्स चुकाते हैं, क्योंकि जीएसटी सभी उपभोक्ताओं पर समान रूप से लागू होता है। उन्होंने इस बात को स्पष्ट करने के लिए बिस्किट खरीदने वाले आम आदमी और रिक्शा चालक का उदाहरण दिया। हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों और वित्त विशेषज्ञों ने उनके इस दावे को अधूरा और भ्रामक बताया, यह कहते हुए कि भारत में अधिकांश आवश्यक वस्तुओं पर या तो कोई टैक्स नहीं है या बहुत कम जीएसटी लगता है।


गरीब और अमीर का समान टैक्स बोझ

मुकुलिका बनर्जी ने पूर्व बीबीसी पत्रकार परवेज आलम के पॉडकास्ट में कहा कि भारत में लोग टैक्स को केवल आयकर के रूप में समझते हैं। उनके अनुसार, केवल तीन प्रतिशत लोग आयकर का भुगतान करते हैं, जबकि जीएसटी हर नागरिक से लिया जाता है। उन्होंने कहा कि जब गरीब व्यक्ति कोई सामान खरीदता है, तो वह भी वही टैक्स चुकाता है जो अमीर चुकाता है। बनर्जी ने पारले-जी बिस्किट का उदाहरण देते हुए कहा कि एक रिक्शा चालक और एक अमीर व्यक्ति एक ही पैकेट पर समान जीएसटी देते हैं, लेकिन गरीब की कम आय के कारण उसके लिए टैक्स का बोझ अधिक हो जाता है.


विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया


बनर्जी के बयान के बाद सोशल मीडिया और आर्थिक हलकों में तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली। निवेश बैंकर सोमनाथ मुखर्जी ने कहा कि गरीबों द्वारा उपयोग की जाने वाली अधिकांश चीजें टैक्स मुक्त हैं या उन पर केवल पांच प्रतिशत जीएसटी लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि अमीरों के उपभोग में लग्जरी और महंगे उत्पाद शामिल होते हैं, जिन पर अधिक टैक्स लगता है। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सुषांत सरीन ने भी बनर्जी के तर्कों की आलोचना की, यह कहते हुए कि अप्रत्यक्ष कर हमेशा से आय के अनुपात में गरीबों पर अधिक प्रभाव डालते हैं, और यह कोई नई बात नहीं है।


जीएसटी में सुधार

सरकार ने 2026-27 के बजट में जीएसटी 2.0 सुधार लागू किए थे। इसके तहत कई वस्तुओं पर टैक्स कम किया गया और कुछ आवश्यक चीजों को पूरी तरह टैक्स मुक्त रखा गया। अनपैक्ड अनाज, दालें, फल और सब्जियों पर कोई जीएसटी नहीं है। वहीं, दवाइयों, शिक्षा से जुड़े उत्पादों और आवश्यक खाद्य वस्तुओं पर केवल पांच प्रतिशत टैक्स रखा गया है। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य आम आदमी पर बोझ कम करना और टैक्स ढांचे को सरल बनाना है ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके।


टैक्स व्यवस्था पर बहस

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारत की टैक्स व्यवस्था को लेकर पुरानी बहस को जन्म दिया है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अप्रत्यक्ष करों का प्रभाव गरीबों पर अधिक होता है, क्योंकि उनकी आय सीमित होती है। वहीं, कई अर्थशास्त्री यह भी कहते हैं कि सरकार गरीबों को मुफ्त राशन, स्वास्थ्य योजनाएं और अन्य कल्याणकारी सुविधाएं देकर संतुलन बनाने की कोशिश करती है।