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भारत में निवेश पर पश्चिम एशिया के संघर्ष का प्रभाव: बीएमआई रिपोर्ट

फिच ग्रुप की बीएमआई ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों का भारत में निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। रिपोर्ट में आर्थिक वृद्धि का अनुमान 7 प्रतिशत पर रखा गया है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिमों के चलते स्थिति की गंभीरता को समझने की आवश्यकता है। जानें इस रिपोर्ट में और क्या कहा गया है और इसका भारत के व्यापार समझौतों पर क्या असर हो सकता है।
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भारत में निवेश पर पश्चिम एशिया के संघर्ष का प्रभाव: बीएमआई रिपोर्ट

भारत में निवेश पर भू-राजनीतिक जोखिमों का असर

 फिच ग्रुप की एक शाखा, बीएमआई, ने मंगलवार को बताया कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के कारण भारत में निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इससे यूरोपीय संघ (ईयू) और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर सकारात्मक प्रभाव भी कम हो सकता है। बीएमआई ने अपनी ‘इंडिया आउटलुक’ रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक वृद्धि का अनुमान 7 प्रतिशत पर बनाए रखा है। हालांकि, उसने भू-राजनीतिक जोखिमों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह स्थिति का मूल्यांकन कर रही है ताकि भारत के जीडीपी पर इसके संभावित प्रभाव का आकलन किया जा सके।


 रिपोर्ट में कहा गया है, “मार्च से अनिश्चितता में वृद्धि होने की संभावना है। इससे भारत में निवेश में कमी आ सकती है, जिससे ईयू और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों का सकारात्मक प्रभाव आंशिक रूप से कम हो सकता है।” अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमले किए, जिसके जवाब में ईरान ने इजराइल और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइलें दागीं। इसके बाद, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी दी। यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक तेल एवं गैस आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण रास्ता है।


शोध एवं विश्लेषण फर्म बीएमआई ने कहा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह से बंद हो जाता है, तो तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि के कारण भारत की जीडीपी पर 0.5 प्रतिशत अंक तक का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। तेल की कीमतों में वृद्धि से आयात बिल बढ़ेगा और ईंधन की महंगाई पर दबाव पड़ेगा। भारत और अमेरिका ने पिछले महीने एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमति जताई थी, जिसमें शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।


इस बीच, अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने फरवरी में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए व्यापक जवाबी शुल्क को अवैध करार दिया, यह कहते हुए कि राष्ट्रपति ने 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपात आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत मिले अधिकारों से अधिक कदम उठाया। फैसले के बाद, अमेरिका ने 24 फरवरी से 150 दिनों के लिए सभी देशों पर 10 प्रतिशत शुल्क लगा दिया है। इस शुल्क को बाद में 15 प्रतिशत तक बढ़ाने की घोषणा की गई, लेकिन इस पर अभी कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है। दूसरी ओर, भारत और यूरोपीय संघ के बीच जनवरी में मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर सहमति बनी, जिसे कानूनी अनुमोदन मिलने के बाद एक वर्ष के भीतर लागू किया जाएगा।