भारतीय वित्तीय प्रणाली में बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका: आरबीआई गवर्नर का बयान
आरबीआई गवर्नर का सहयोगात्मक दृष्टिकोण
आरबीआई गवर्नर ने बैंकिंग क्षेत्र में सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भारतीय वित्तीय प्रणाली में बैंकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि वित्तीय मध्यस्थता और समावेशी विकास के लिए बैंकों का सहयोग आवश्यक है। गवर्नर ने यह भी कहा कि भारत जैसे देश के लिए नियामक और बैंकों के बीच सहयोग का दृष्टिकोण न केवल आवश्यक है, बल्कि अनिवार्य भी है।
गवर्नर ने मुंबई में आयोजित 'कॉलेज ऑफ सुपरवाइजर्स' के तीसरे वार्षिक वैश्विक सम्मेलन में कहा कि जब बैंक और अन्य विनियमित संस्थाएं पर्यवेक्षकों को 'गलतियां निकालने वाले इंस्पेक्टर' के रूप में नहीं, बल्कि साझेदार के रूप में देखें, तब नियामक की कार्रवाई सबसे प्रभावी होती है।
बैंकों की कार्यप्रणाली में सुधार का उद्देश्य
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक की सख्त कार्रवाई के बारे में बाजार में अक्सर आशंकाएं होती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि रिजर्व बैंक की प्रवर्तन कार्रवाइयों का मुख्य उद्देश्य बैंकों को दंडित करना नहीं है, बल्कि सुधार करना है। उनके अनुसार, इन कार्रवाइयों के दो मुख्य उद्देश्य हैं: एक, जिन संस्थाओं के खिलाफ कदम उठाए गए हैं, उन्हें संकेत देना और दूसरा, अन्य संस्थाओं को मानकों और नियामक की अपेक्षाओं के प्रति जागरूक करना।
उपभोक्ताओं के लिए बेहतर सुविधाएं प्रदान करना
गवर्नर ने कहा कि आरबीआई का मानना है कि पर्यवेक्षण का कार्य केवल मौजूदा नियमों को लागू करना नहीं है, बल्कि यह नियामकीय कमी और गड़बड़ियों को पहचानकर नियमों को और बेहतर बनाने में भी मदद करता है। उन्होंने पिछले साल को-लैंडिंग और सोने-चांदी के आभूषणों के बदले ऋणों से जुड़े निदेशों में किए गए संशोधनों का उदाहरण दिया।
संजय मल्होत्रा ने कहा कि नियामक और विनियमित संस्थाएं एक ही टीम का हिस्सा हैं, न कि विरोधी खेमे में। उन्होंने बैंकों से आग्रह किया कि वे उपभोक्ताओं को बिना किसी रुकावट और परेशानी के अधिकतम योजनाओं का लाभ उठाने में मदद करें।
