भारतीय शेयर बाजार में गिरावट: निवेशकों के लिए चेतावनी संकेत
शेयर बाजार में दबाव का माहौल
शुरुआत में भारतीय शेयर बाजार स्थिर नजर आए, लेकिन जैसे-जैसे कारोबार आगे बढ़ा, बाजार में दबाव स्पष्ट हो गया। 8 जनवरी को, भारतीय शेयर बाजार ने अक्टूबर के बाद पहली बार अपने 50-दिवसीय मूविंग एवरेज को छू लिया, जिससे निवेशकों में सतर्कता और आगे की कमजोरी की आशंका बढ़ गई है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ने 1 अक्टूबर 2024 के बाद पहली बार 50-DMA को छुआ है।
तकनीकी स्तरों का महत्व
विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान में तकनीकी स्तर अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। स्वतंत्र विश्लेषक दीपक जसानी के अनुसार, यदि निफ्टी 26,000 के 50-DMA के ऊपर मजबूती से बंद नहीं होता है, तो बाजार में और गिरावट देखने को मिल सकती है, जिससे सूचकांक 25,460 तक गिर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव
बाजार पर दबाव केवल घरेलू कारणों से नहीं है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की टिप्पणी ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त कार्रवाई की बात कही गई है। इसका सीधा असर भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों पर पड़ा है, जिससे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के शेयरों में गिरावट आई है।
कैपिटल गुड्स सेक्टर में गिरावट
कैपिटल गुड्स सेक्टर भी दबाव में है। चीन से आयात पर लगी पाबंदियों में ढील के बाद बीएचईएल और लार्सन एंड टुब्रो जैसे शेयरों में गिरावट आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि विभिन्न सेक्टरों से आ रही नकारात्मक खबरें निवेशकों को मुनाफावसूली के लिए प्रेरित कर रही हैं, जिससे वे फिलहाल साइडलाइन रहना पसंद कर रहे हैं।
निवेशकों की धारणा
अन्य बाजार जानकारों के अनुसार, जब तक निफ्टी 26,000 और सेंसेक्स 84,500 के स्तर से नीचे बना रहता है, तब तक कमजोर धारणा बनी रह सकती है। इस स्थिति में निफ्टी के 25,750–25,700 और सेंसेक्स के 84,000–83,700 तक जाने की संभावना है। वहीं, यदि निफ्टी 26,000 और सेंसेक्स 84,500 के पार मजबूती दिखाता है, तो बाजार में सीमित राहत मिल सकती है।
ऊंचे टैरिफ का व्यापक प्रभाव
आनंद राठी ग्लोबल फाइनेंस में ट्रेजरी प्रमुख हरसिमरन साहनी का कहना है कि ऊंचे टैरिफ का प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके व्यापक आर्थिक परिणाम भी हो सकते हैं। निर्यात आधारित क्षेत्रों पर दबाव और ऊर्जा लागत में वृद्धि से महंगाई प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे नीति-स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ सकती है। इससे तरलता और उधारी की जरूरतें प्रभावित हो सकती हैं और बॉंड यील्ड में भी तेजी आ सकती है।
वैश्विक बाजारों की स्थिति
वैश्विक स्तर पर भी माहौल अनुकूल नहीं है। अमेरिका के बाजारों में कमजोरी, व्यापार और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में अनिश्चितता, और अमेरिकी रोजगार आंकड़ों का इंतजार निवेशकों की धारणा पर असर डाल रहा है। इन सभी कारणों के बीच, भारतीय बाजार फिलहाल सावधानी के दौर से गुजर रहे हैं।
