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म्यूचुअल फंड में साइड पॉकेट: निवेशकों के लिए सुरक्षा का उपाय

म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय सुरक्षा एक प्रमुख चिंता होती है। साइड पॉकेट एक ऐसा उपाय है जो निवेशकों को डिफॉल्ट के समय में सुरक्षा प्रदान करता है। यह प्रक्रिया कैसे काम करती है और SEBI ने इसे क्यों लागू किया, जानें इस लेख में। भारत में इसके पहले उदाहरण के साथ, यह जानना महत्वपूर्ण है कि साइड पॉकेट निवेशकों के लिए कैसे लाभकारी हो सकता है।
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म्यूचुअल फंड में साइड पॉकेट: निवेशकों के लिए सुरक्षा का उपाय

साइड पॉकेट का महत्व

जब आप म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो आपकी सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि आपका धन सुरक्षित रहे। कभी-कभी बाजार में ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जब कुछ कंपनियाँ भारी नुकसान में चली जाती हैं। ऐसे समय में निवेशकों के नुकसान को कम करने के लिए एक नियम काम आता है, जिसे 'साइड पॉकेट' कहा जाता है। यह एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है, जो आपके पूरे निवेश को डूबने से बचाता है।


डिफॉल्ट की स्थिति में साइड पॉकेट का कार्य

जब कोई म्यूचुअल फंड किसी कंपनी के बॉन्ड में निवेश करता है, तो वह कंपनी समय पर ब्याज और मूलधन लौटाने का वादा करती है। यदि वह कंपनी कंगाल हो जाती है और कर्ज चुकाने में असमर्थ होती है, तो इसे 'डिफॉल्ट' कहा जाता है। ऐसे हालात में फंड मैनेजर उस डूबते हुए निवेश को सुरक्षित पैसों से अलग कर देता है। यह व्यवस्था 'सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया' (SEBI) ने दिसंबर 2018 में 'इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज' (IL&FS) संकट के बाद लागू की थी।


साइड पॉकेट की प्रक्रिया

साइड पॉकेट एक अलग थैली की तरह कार्य करता है। जब किसी म्यूचुअल फंड के पोर्टफोलियो में कोई कंपनी डिफॉल्ट करती है या उसकी क्रेडिट रेटिंग गिर जाती है, तो उस खराब हिस्से को अच्छे निवेश से अलग कर दिया जाता है। क्रेडिट रेटिंग का अर्थ है कि कोई कंपनी अपने कर्ज चुकाने में कितनी सक्षम है, और यह रेटिंग 'क्रेडिट रेटिंग इंफॉर्मेशन सर्विसेज ऑफ इंडिया लिमिटेड' (CRISIL) और 'क्रेडिट एनालिसिस एंड रिसर्च लिमिटेड' (CARE) जैसी एजेंसियों द्वारा दी जाती है।


SEBI द्वारा साइड पॉकेट का कार्यान्वयन

भारत में साइड पॉकेट की शुरुआत 2018 में 'इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज' (IL&FS) संकट के बाद हुई। यह एक बड़ी कंपनी थी जो सड़कें और पुल बनाने के लिए लोन देती थी, लेकिन अचानक डिफॉल्ट कर गई। इसके बाद 'नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी' (NBFC) और होम लोन देने वाली कंपनियों के बॉंड भी संकट में आ गए। इस स्थिति को देखते हुए 'एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया' (AMFI) ने 5 अक्टूबर 2018 को SEBI को साइड पॉकेट का प्रस्ताव दिया।


साइड पॉकेट का कार्यप्रणाली

जब किसी फंड में किसी कंपनी का बॉंड इन्वेस्टमेंट ग्रेड से नीचे आ जाता है, तो 'एसेट मैनेजमेंट कंपनी' (AMC) साइड पॉकेट बना सकती है। इसके लिए म्यूचुअल फंड के ट्रस्टीज की मंजूरी आवश्यक होती है। मंजूरी मिलने के बाद पूरा निवेश दो हिस्सों में बंट जाता है। पहला हिस्सा 'मेन पोर्टफोलियो' होता है, जिसमें सभी अच्छे निवेश होते हैं। दूसरा हिस्सा 'साइड पॉकेट पोर्टफोलियो' होता है, जिसमें डिफॉल्ट हुए निवेश होते हैं।


भारत में साइड पॉकेट के उदाहरण

भारत में इसका पहला उदाहरण 'दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड' (DHFL) संकट के दौरान 2019 में देखा गया। इस कंपनी ने पैसों की तंगी के कारण अचानक डिफॉल्ट किया। म्यूचुअल फंड कंपनियों का इस कंपनी में लगभग 5,336 करोड़ रुपये का निवेश फंसा हुआ था। तब 'टाटा म्यूचुअल फंड' पहली ऐसी AMC बनी जिसने SEBI के नियमों के तहत अपनी तीन स्कीम में DHFL का हिस्सा साइड पॉकेट में डालकर अलग कर दिया।