भारत की निजी विश्वविद्यालयों की वास्तविकता: गड़बड़झाले से परे
निजी विश्वविद्यालयों की स्थिति पर ध्यान
हाल ही में गलगोटिया विश्वविद्यालय के विवाद ने भारत में निजी विश्वविद्यालयों की वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डाला है। हालांकि गलगोटिया के मामले पर अधिक चर्चा हुई है, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि अन्य कई निजी विश्वविद्यालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। ये संस्थान वास्तविक अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, चौंकाने वाली सुर्खियों के लिए प्रयासरत हैं।
एआई समिट के दौरान उठे विवाद ने इस बात को उजागर किया कि कैसे निजी विश्वविद्यालयों ने बनावटी उपलब्धियों के माध्यम से ध्यान आकर्षित करने की रणनीति अपनाई है। यह रणनीति दो तरीकों से काम करती है: एक, यह छात्रों को आकर्षित करती है, और दूसरा, ये संस्थान सरकारी अनुदान का लाभ उठाते हैं।
पेटेंट अर्जियों की संख्या को एक मानक के रूप में लिया गया है, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। उदाहरण के लिए, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी ने 2020 से 2025 के बीच 7,096 पेटेंट अर्जियां दाखिल कीं, लेकिन उनमें से केवल 164 पर पेटेंट प्राप्त हुआ, जो कि 2.3 प्रतिशत की सफलता दर है।
इसके विपरीत, प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों जैसे आईआईटी और एनआईटी की सफलता दर 40 प्रतिशत से अधिक रही है। यह इस बात का संकेत है कि इन संस्थानों में पेटेंट अर्जियों की गुणवत्ता और परीक्षण की प्रक्रिया अधिक मजबूत है।
हालांकि, निजी विश्वविद्यालयों की इस स्थिति के लिए केवल वे ही जिम्मेदार नहीं हैं। भारत सरकार ने 2021 में पेटेंट कानून में संशोधन कर अर्जियों को दाखिल करना आसान बना दिया था, जिससे इम्प्रेशन बनाने पर अधिक जोर दिया गया। क्या सरकार इस विवाद से कुछ सीख लेगी?
