भारत में शिक्षा प्रणाली की चुनौतियाँ: नीति आयोग की नई रिपोर्ट
शिक्षा की कठिनाइयाँ
नई दिल्ली: शिक्षा प्राप्त करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों को स्कूल में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएं, ताकि वे स्कूल से जुड़ाव महसूस करें। लेकिन नीति आयोग द्वारा जारी की गई रिपोर्ट चिंताजनक है। देश में हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहाँ पानी, शौचालय, बिजली, प्रयोगशालाएँ और शिक्षक नहीं हैं। कुछ स्कूलों में तो छात्रों की संख्या भी नगण्य है।
छात्रों की कमी
छात्रों के इंतजार में स्कूल
प्राथमिक कक्षाओं के बाद छात्रों का स्कूल छोड़ने की दर कई राज्यों में एक गंभीर समस्या बन गई है। सरकारी स्कूलों में केवल 10-15 प्रतिशत शिक्षक ही अपने विषय में 60 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त कर पाते हैं।
स्कूली शिक्षा प्रणाली की स्थिति
भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली
नीति आयोग की नई रिपोर्ट, जिसका शीर्षक 'भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली' है, में यह दर्शाया गया है कि हजारों स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इस रिपोर्ट में स्कूलों के बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों की संख्या, नामांकन और सीखने के संकेतकों पर आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं।
बुनियादी ढांचे की कमी
नीति आयोग की स्कूली शिक्षा रिपोर्ट: बुनियादी ढांचा
- देश के 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए कार्यात्मक शौचालय नहीं हैं, जबकि 61,540 स्कूलों में कोई भी उपयोग योग्य शौचालय नहीं है।
- पिछले एक दशक में स्कूलों में बिजली की उपलब्धता 55 प्रतिशत से बढ़कर 91.9 प्रतिशत हो गई है, लेकिन 1.19 लाख स्कूलों में अब भी बिजली की सुविधा नहीं है।
- 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं, जिनमें से 61,540 स्कूलों में कोई भी शौचालय उपयोग योग्य नहीं है।
- लगभग 14,505 स्कूलों में पानी की सुविधा नहीं है, और 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा भी नहीं है।
- सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में से केवल 51.7 प्रतिशत में विज्ञान प्रयोगशालाएं हैं।
शिक्षकों की कमी
नीति आयोग की स्कूल शिक्षा रिपोर्ट: शिक्षकों के रिक्त पद
रिपोर्ट के अनुसार, देश में 1,04,125 स्कूल एक ही शिक्षक के साथ चल रहे हैं, जिनमें से लगभग 89 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। कुछ राज्यों में विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) बहुत अधिक है। झारखंड में सरकारी माध्यमिक स्कूलों का पीटीआर 47:1 है, जबकि आदर्श अनुपात 10:1 से 18:1 के बीच माना जाता है।
प्राथमिक शिक्षकों के रिक्त पदों की संख्या निम्नलिखित राज्यों में सबसे अधिक है:
- बिहार: 2,08,784
- झारखंड: 80,341
- मध्य प्रदेश: 47,122
ड्रॉप-आउट दर
ड्रॉप-आउट प्रतिशत
देश में लगभग 7,993 स्कूल ऐसे हैं जिनमें शून्य नामांकन है। पश्चिम बंगाल में ऐसे 'फर्जी' स्कूलों की संख्या सबसे अधिक (3,812) है। माध्यमिक विद्यालयों से उच्च ड्रॉप-आउट दर एक और बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय औसत 11.5 प्रतिशत है।
जिन राज्यों में ड्रॉप-आउट दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, वे हैं:
- पश्चिम बंगाल: 20%
- अरुणाचल प्रदेश: 18.3%
- कर्नाटक: 18.3%
- असम: 17.5%
उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थिति और बिगड़ गई है, जहाँ माध्यमिक शिक्षा से बच्चों के ड्रॉपआउट की संख्या में वृद्धि हुई है।
शिक्षा पर खर्च
रिपोर्ट में खर्च पर भी बात
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत अपनी जीडीपी का केवल 4.6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है। ब्रिटेन और अमेरिका के लिए यह आंकड़ा लगभग 5.9 प्रतिशत है।
पारख आधारित परिणाम मानचित्रण के अनुसार, झारखंड, गुजरात और जम्मू-कश्मीर का प्रदर्शन खराब रहा है, जबकि पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र और राजस्थान का प्रदर्शन बेहतर रहा है।
परख (या समग्र विकास के लिए ज्ञान का प्रदर्शन मूल्यांकन, समीक्षा और विश्लेषण) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के अंतर्गत 2023 में बनाया गया राष्ट्रीय मूल्यांकन नियामक है।
